Tuesday, June 19, 2018

बामणों का आरक्षण विरोधी अभियान और वंचित नेतृत्व की चुप्पी को देखते हुए, बामणमुक्त व्यवस्था का अभियान क्या समय की मांग नहीं?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

बामणों का आरक्षण विरोधी अभियान और वंचित नेतृत्व की चुप्पी को देखते हुए, बामणमुक्त व्यवस्था का अभियान क्या समय की मांग नहीं?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

भाजपा के नेतृत्व में केन्द्र की सत्ता को 4 साल पूर्ण हो जाने तथा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, हरियाणा जैसे हिंदी भाषी राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों के बाद लोक सभा के आम चुनावों से पहले अचानक बामणों की आरक्षण विरोधी मुहिम बढ गयी है! संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए ब्राह्मण आरक्षण विनाशक हवन कर रहे हैं। आरक्षण के खिलाफ जल सत्याग्रह का नाटक कर रहे हैं। इन सबको ब्राह्मणवादी मीडिया बढाचढाकर प्रचारित कर रहा है। इससे जहां एक ओर इस कारण संविधान की गरिमा को क्षति पहुंच रही है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय की अवधारणा को सरेआम चीर हरण किया जा रहा है।



यही नहीं, ब्राह्मणों के इस नाटकीय अभियान की अनदेखी करके केन्द्र सरकार सामाजिक न्याय एवं वंचित समुदायों के हितों को नुकसान पहुंचाने वालों के असंवैधानिक कृकुत्यों की अनदेखी करके अपने संघी चरित्र को उजागर कर रही है। इसके साथ-साथ हम जैसे विचारक एवं चिंतक जो हमेशा सभी के हकों की पैरोकारी करते थे और हमेशा इस बात पर जोर देते थे और बामणों का नहीं, बल्कि बामणवादी व्यवस्था का विरोध करने में विश्वास करते थे। अब खुद बामणों द्वारा हमको बामणों का खुलकर विरोध करने को उकसाया जा रहा है।

इस पृष्ठभूमि में सबसे दु:खद पहलु यह है कि 1950 से 2018 तक सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों या अनारक्षित क्षेत्रों से वंचित समुदायों के वोटों के बल पर जीतकर लोक सभा एवं विधानसभाओं में पहुंचने वाले जनप्रतिनिधियों की चुप्पी शर्मनाक है। ऐसा लगता है, जैसे बामणों की आरक्षण विरोधी मुहिम का वंचितों के जनप्रतिनिधियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है?

क्या वंचित समुदायों के लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा, कि आरक्षण को समाप्त करने के लिये जो कुछ भी बामण जाति के लोग संविधान को धता बताकर सार्वजनिक रूप से कुप्रचार कर रहे हैं, उस पर वंचितों के पूर्व, भूतपूर्व एवं वर्तमान निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की चुप्पी क्या बामणों के आरक्षण विरोधी अभियान की समर्थक नहीं है? यही नहीं तो वंचित समुदायों के हितों के नाम पर राजनीतिक रोटी सेंकने वाले राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनों की चुप्पी भयावह स्थिति का संकेत है!

ऐसे में वंचित समुदायों के आगे बढ चुके सुशिक्षित लोगों का अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है कि वे अपने समुदायों के आम मतदाताओं को, अपने समुदायों के जनप्रतिनिधियेां की इस चुप्पी के मायने समझायें। वंचित समुदायों के आम लोगों को भी खुद ही जागना होगा और संभावित चुनावों से पूर्व एवं चुनावों के समय चुनावी प्रत्याशियों से सीधे सवाल पूछकर, उन्हें आम जनता के दबार में लाकर कटघरे में खड़ा करना होगा। 
साथ ही वंचित समुदायों को अब कड़ा निर्णय लेकर भारतीय लोकतंत्र को साढे तीन फीसदी यूरेशियन आर्यों के वंशज ब्राह्मणों के चंगुल में फंसी राजनीतिक, न्यायिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था को इनसे मुक्त करवाने का दृढ निश्चय करना होगा। अन्यथा बहुत देर हो जायेगी।

आखिर कब तक सिसकते रहोगे?
बोलोगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे?
लड़ोगे नहीं तो जीतोगे कैसे?
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख
ह​क रक्षक दल सामाजिक संगठन
9875066111, 19.06.2018

Friday, June 15, 2018

राज्य सरकार के मौन समर्थन से टोडाभीम करौली राजस्थान में नौकरों द्वारा जनता का मानमर्दन। राज्य की कानून व्यवस्था पूरी तरह से असफल हो चुकी है। अत: राज्य सरकार बर्खास्त की जाये।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन द्वारा राजस्थान के राज्यपाल को भेजा ज्ञापन और लिखा कि राज्य सरकार के मौन समर्थन से टोडाभीम करौली राजस्थान में नौकरों द्वारा जनता का मानमर्दन। राज्य की कानून व्यवस्था पूरी तरह से असफल हो चुकी है। अत: राज्य सरकार बर्खास्त की जाये।


प्रेषक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, जयपुर, राजस्थान मो. 9875066111

ज्ञापन पत्र दिनांक: 15.06.2018
प्रतिष्ठा में,
माननीय राज्यपाल
राजस्थान सरकार, जयपुर।

विषय: राज्य सरकार के मौन समर्थन से टोडाभीम करौली राजस्थान में नौकरों द्वारा जनता का मान मर्दन। राज्य की कानून व्यवस्था पूरी तरह से असफल हो चुकी है। अत: राज्य सरकार बर्खास्त की जाये।

माननीय महोदय,

उपरोक्त विषय में ध्यान आकृष्ट करके हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के सदस्यों और लाखों समर्थकों की ओर से आपको जनहित में अवगत करवाया जाता है कि—
1-सम्पूर्ण राजस्थान के सभी जिलों की भांति करौली जिले की टोडाभीम तहसील में भी प्रशासनिक मेलजोल के चलते सार्वजनिक निर्माण कार्यों में जमकर भ्रष्टाचार व्याप्त है। दूसरी ओर राज्य सरकार द्वारा आम चुनावों से ठीक पहले जनता का धन बर्बाद करके 'न्याय आपके द्वार' नाम का नाटक संचालित किया जा रहा है। जिसमें जनता की सुनवाई के अलावा सबकुछ हो रहा है।
2-दिनांक: 12.06.2018 को 'न्याय आपके द्वार' नाटक के दौरान गांव कमालपुरा टोडाभीम, जिला कारौली में एसडीएम के समक्ष जब जनता ने उपरोक्तानुसार व्याप्त भ्रष्टाचार की शिकायत करनी चाही तो आश्चर्यजनक रूप से वहां पर उपस्थित सरकारी अमले ने अभ्यस्त गुण्डों की तरह मिलकर एसडीएम एवं बीडीयो के नेतृत्व में शिकायत कर्ता के साथ न मात्र मारपीट की, बल्कि उसे जमीन पर पटककर जूतों से कुचला गया, उसे अपमानित करके जनता का मानमर्दन किया गया। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और इसकी खबर स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुकी है।
3-स्थानीय पुलिस द्वारा भ्रष्ट एवं आपराधिक कार्यों में लिप्त अधिकारियों तथा उनके सहयोगियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने के बजाय, पीड़ित व्यक्ति को ही गिरफ्तार करके टॉर्चर किया गया। पीड़ित को सत्ताधारी लोगों और प्रशासन ने इतना डरा दिया है कि वह कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है।
4-सरेआम मारपीट करके जनता का मानमर्दन करने वाले प्रशासनिक अमले के विरुद्ध तुरंत भारतीय दंड संहिता तथा विभागीय नियमों के तहत किसी प्रकार की कानूनी कार्यवाही नहीं होना, जनता के उत्पीडन और संत्रास में उच्च प्रशासन एवं राज्य सरकार की मौन सहमति का स्पष्ट प्रमाण है। इस कारण केवल करौली जिले में ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राजस्थान में आम लोग प्रशासन की मनमानी से भयभीत और आतंकित हैं। जो संविधान से संचालित लोकतंत्र के माथे पर कलंक है।
5-प्रशासनिक अमले के विरुद्ध कार्यवाही करने के बजाय जनता और जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध बनावटी मुकदमें दायर करके सरकारी आतंक फैलाया जा है। अपराधियों को तुरंत गिरफ्तार नहीं करने से एक ओर जनता में सरकार, संविधान और कानून के प्रति विश्वास भंग हो रहा है, वहीं दूसरी ओर यह भारतीय लोकतंत्र के दामन पर कभी न धुलने वाला बदनुमा दाग सिद्ध हो चुका है। इन हालातों में राज्य की कानून व्यवस्था पूरी तरह से असफल होकर राजनीति की भेंट चढ़ चुकी है। 

अत: आपको उपरोक्तानुसार स्थिति से अवगत करवाकर आग्रह है कि कृपया इस बारे में अविलम्ब आरोपी प्रशासनिक अमले के विरुद्ध निष्पक्ष कठोर कानूनी कार्यवाही करवाकर, भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति के समक्ष राज्य सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की जावे। जिससे संविधान के प्रति जनता की आस्था बहाल की जा सके।
भवदीय
(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा)
राष्ट्रीय प्रमुख-HRD

Monday, June 4, 2018

सोशल मीडिया का विमर्श भानगढ में जमीनी विमर्श में बदला

सोशल मीडिया का विमर्श भानगढ में जमीनी विमर्श में बदला

भानगढ 03, जून। प्रकृति की गौद में स्थि​त ऐतिहासिक ऊजड़ नगरी भानगढ, जिला अलवर, राजस्थान के प्रांगण/अहाते में सोशल मीडिया पर एक-दूसरे से जुड़े मीणा समुदाय के सक्रिय मित्रों का रविवार, 03 जून, 2018 को सामूहिक मिलन समारोह सम्पन्न हुआ। जिसमें राष्ट्रीय मीणा महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष 80 वर्षीय भंवरलाल मीणा सपत्नीक, समाज सेवी चंदा लाल चकवाला सहित भरतपुर, झालावाड़, अलवर, कोटा, बारां, जयपुर, सीकर, करौली, सवाई माधोपुर, बूंदी आदि जिलों के 300 से अधिक जिज्ञासु युवा, प्रोढ तथा वरिष्ठजन उपस्थित हुए।



प्रकृति की गोद में बड़ के पेड़ के नीचे सामान्य आदिवासी परम्परानुसर जाजम एक पर सोशल मीडिया के माध्यम से मेरी पहचान में आये मित्रों में अनीता मीणा, मोतीलाल मीणा, भरतलाल मीणा, भागीरथ मीणा, राजेन्द्र मीणा, सरदार मीणा, सोनू मंडावर, समयराज मीणा, बीएल जड़ावता, अनिल टाटू, डीएस देवराज, मुकेश मीणा पिप्पल्या, देवप्रकाश मीणा, विक्रमसिंह मीणा आदिवासी, कर्मपाल, प्यारेलाल मीणा, बाबूलाल मीणा अलवर, रूपचंद झरवाल, राजकुमार अभियंता मीणा, रामपाल सिंह, राजेंद्र बागड़ी, अवधेश मीणा, बीआर मीणा मिलकपुर, रामकेश हातोज, अशोक बाबारामदेव, बीएल मीणा आदिवासी, करण मीणा, मनोज कुमार मीणा, भूरसिंह मीणा, चंद्र प्रकाश मीणा, कपिल मीणा, मांगीलाल मीणा दौसा, रोहित मीणा, हीरालाल मीणा, राजेश मीणा, चेतराम मीणा मेडिया, मांगीलाल पटेल, अशोक करोल, श्रीमन मीणा पीतूपुरा कैलादेवी, छुट्टन लाल मीणा भड़क्या, लखन लाल मीणा खिरकिड़ा, एनआर सत्तावन मीणा, शिवसिंह मीणा, गुलाब चंद मीणा, रमेश मीणा क्यारबडवाड़ी, कैलाश चंद मीणा, अभिषेक सखीपुरा, ओम प्रकाश पुरोहितों का बास, धाकड़ किशन, अशोक मीणा मास्टर, महेश मीणा, अशोक बड़ोली, सतीश मालावास, सुमित मीणा आदिवासी, प्रहलाद माणौता, महेन्द्र मीणा, रामदयाल मीणा, राजू धीरोड़ा, राजकुमार मीणा, जगदीश मीणा, सुनील मीणा, नेमी मीणा, कमल मीणा, शंकर पेंटोली, नादान सिंह मीणा, मोहन मीणा, प्रहलाद मीणा, गजानंद मीणा, भरत मरमट, आदि अनेकानेक विद्यार्थियों, कार्यरत तथा सेवारत कर्मचारियों-अधिकारियों के साथ-साथ सोशल मीडिया से सीधे नहीं जुड़कर परोक्ष रूप से सोशल मीडिया से जुड़े दर्जनों संजीदा लोगों की उपस्थिति के बीच महत्वूपर्ण सामाजिक एवं संवैधानिक मुद्दों पर तकरीबन चार घंटे गहन गंभीर मंत्रणा हुई। जिससे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला।



छुटपुट वैचारिक मतभेदों के उपरांत भी प्रत्यक्षत: मिलना और मिलकर सभी सामयिक मुद्दों पर खुलकर विमर्श करना ही इस आयोजन की अपने आप में सबसे बड़ी उपलब्धी और सफलता है। आयोजन के बाद शानदार भोजन की व्यवस्था भी की गयी। इस आयोजन को आयोजित करने और इसको सफल बनाने के लिये सक्रिय रहकर श्रमदान और आर्थिक सहयोग करने वाले मित्रों का विशेष आभार और शुक्रिया। मुझे इसमें शामिल होकर सीखने अवसर मिला, जो अपने आप में गौरव की बात है। जयपुर से साथ ले जाने वाले राजेश मीणा और वापसी में साथ लेकर आने वाले भरत लाल मीणा दोनों का व्यक्तिगत रूप से आभार। इस आयोजन की सफलता का यही सबसे बड़ा पैमाना है कि राष्ट्रीय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भंवर लाल मीणा ने सपत्नीक शामिल होकर अपने अनुभव बांटे तथा मीणा समाज के सबसे बड़े फेसबुक ग्रुप के संस्थापक संचालक देव प्रकाश मीणा समय निकाल कर इसमें शामिल हुए। इस आयोजन की सफलता का यह भी बड़ा पैमाना है कि इससे प्रेरणा लेकर करौली, कोटा आदि क्षेत्रों में भी इसी प्रकार के आयोजन करने के लिये अभी से सोशल मीडिया वैचारिक मंत्रणा शुरू हो चुकी है। ऐसी सभी भावी आयोजनों की सफलता की अग्रिम शुभकामनाएं।

नोट: जिन भी मित्रों के पास इस आयोजन के फोटो उपलब्ध हैं, कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में साझा/शेयर करके आयोजन की सफलता का सजीव चित्रण पेश करके सहयोग करें।

सेवासुत डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 
9875066111/04.06.2018

Sunday, May 27, 2018

प्रत्येक मीणा के विचारार्थ सवाल?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

प्रत्येक मीणा के विचारार्थ सवाल?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

आपसी चर्चाओं तथा सोशल मीडिया पर जारी चर्चाओं के दौरान राजस्थान की मीणा जनजाति के लोगों में भागवत कथा, रामायण पाठ, सवामणी आदि आयोजनों को लेकर गर्मागरम चर्चाओं का दौर जारी रहता है। एक पक्ष इसे हिंदुत्व तथा धार्मिक भावनाओं से जोड़ता है। जबकि दूसरा पक्ष इसे पाखण्ड, अंधश्रृद्धा, धर्मांधता, मनुवाद, बामणवाद आदि से जोड़ता है। यही नहीं, इसी कारण से कुछ गैर-मीणा आदिवासी भाई मीणा जाति के आदिवासी अस्तित्व और मीणाओं को जनजाति की सूची में शामिल किये जाने पर सवाल उठाते रहते हैं। अजा वर्ग की कुछ जातियों के कुछ लोग भी इसी कारण मीणा जाति के ऊपर अनेक प्रकार के लांछन लगाते हुए छींटाकशी रहते हैं। इस कारण अनेक बार, अनेक लोगों के सामने अप्रिय स्थिति पैदा होती रहती है।

सबसे दु:खद तो यह है कि इस मुद्दे पर हम जाति मीणा के लोग विरोधी विचारों में बंटकर, अनेक बार आपसी विवाद करते हुए देखे जा सकते हैं। जिससे आपसी दूरियां बढती हैं और जो हमारी सामाजिक कमजोरी का कारण बनती हैं। इसलिये हम सभी जिम्मेदार एवं संजीदा लोगों को मीणा जाति की एकता तथा सुरक्षित भविष्य के लिये, इस महत्वपूर्ण तथा संवेदनशील विषय का समय रहते सर्व-स्वीकार्य व्यावहारिक समाधान तलाशना होगा।

जिसके लिये देशभर के मीणा जाति के विद्वजनों की सक्रिय सहभागिता बहुत जरूरी है। ताकि सभी के अमूल्य सुझावों से इसका सर्व-स्वीकार्य तथा व्यावहारिक समाधान संभव हो सके। इसलिये इस विषय पर बिना पूर्वाग्रह के स्वस्थ संवाद एवं निर्णायक विमर्श होना बहुत जरूरी है। ताकि हमारे मध्य एक राय कायम हो सके। इसके विपरीत यदि हम वर्तमान में चुप्पी साधकर इसके समाधान को टालते रहे तो आने वाली पीढियां हमें जिम्मेदार ठहरायेंगी।

मेरा विनम्र मत है कि इस चर्चा को प्रारंभ करने से पहले हमें कुछ अहम सवालों का समाधान कर सकें तो संभव है कि उक्त मुद्दे का आसानी से समाधान होने की उम्मीद की जा सकती है। जैसे-

1. क्या हम मीणा ब्राह्मणी व्यवस्था के अनुसार घोषित चार वर्णों के हिस्से होकर सवर्ण हैं?
2. यदि हम मीणा सवर्ण हैं तो क्या हम ब्राह्मणी व्यवस्था के अनुसार घोषित चार वर्णों के अनुसार ब्रह्मा के पैरों से जन्में शूद्रवंशी हैं?
3. क्या हम मीणा भारत के मूलवंशी/स्वदेशी (indigenous) कबीलों के वंशज होकर अवर्ण और भारत के मूलवासी-आदिवासी हैं?
4. क्या हम मीणा जाति के लोग भारत के आदिवासी न​हीं, बल्कि आर्यों के वंशज हैं?
5. क्या हम मीणा जाति के लोग डॉ. अम्बेड़कर की शोधपरक किताब 'शूद्र कौन थे' के अनुसार सूर्यवंशी क्षत्रियों से ब्राह्मणों द्वारा जबरन शूद्र बनाये गये आर्यों के वंशज हैं?
6. क्या हम मीणा जाति के लोग बहुजन समाजवादी पार्टी की अवधारणा के अनुसार बुद्धवंशियों के वर्तमान वंशजों में शामिल बहुजन हैं?
7. क्या हम मीणा जाति के लोग बामसेफ के वामन मेश्राम की अवधारणा के अनुसार ब्राह्मणों द्वारा घोषित शूद्र समूहों में शामिल भारत की 85 फीसदी कथित मूलनिवासी जातियों के हिस्से हैं?
8. क्या हम मीणा जाति के लोग डॉ. उदित राज की अवधारणा के अनुसार भारत के दलित समूहों में शामिल 85 फीसदी शूद्र हैं?
9. क्या हम कुछ लेखकों की पुस्तकों के अनुसार गुर्जर जाति के वंशज हैं?
10. क्या हम कृषि एवं पशुपालन पर जीवन निर्वाह करने वाली हूण, कुषाण, शक जैसी विदेशी मूल की वर्तमान वंशज किसान और कामगार जातियों में शामिल अवर्ण-अशूद्र हैं?
11. अन्य?

मुझे ऐसा विश्वास है कि यदि हम उक्त सवालों पर बिना पूर्वाग्रह के चर्चा करके ​किसी निर्णय पर पहुंच पाने में सफल हो जाते हैं तो फिर हम मीणा कौन हैं और हमारे धार्मिक आयोजन कितने सही और प्रासंगिक हैं या नहीं हैं? इन सब बातों पर बहुत आसानी से चर्चा करके समाधानकारी निर्णय पर पहुंचने में सफल हो सकेंगे।

अंतिम बात: हमारे द्वारा इस विषय की अनदेखी करने का अभिप्राय है, हम इस विषय को टालकर और आपस में लड़ते-झगड़ते रहना चाहते हैं!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' सेवा, सवाई माधोपुर, राजस्थान, 875066111, 27.05.2018

Tuesday, May 22, 2018

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ विधानसभा चुनावों में बसपा किंग मेकर बन सकती है, बशर्ते...?

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ विधानसभा चुनावों में बसपा किंग मेकर बन सकती है, बशर्ते...?
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

​कांशीराम जी के अथक प्रयासों से भारत में बसपा की स्थापना के समय वंचित समुदायों ने बहुजन शब्द में अपनी पीड़ा का प्रतिबिम्ब देखा था। जिसके चलते बसपा को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा तक मिल गया। मगर कांशीराम जी के रहते हुए ही, उन्हें अउल्लेखनीय हालातों के चलते इतना विवश कर दिया गया कि वे अपने सपनों की पार्टी को बर्बाद होते देखते रहें और उनका दर्दनाक अंत हुआ।

वर्तमान में भाजपा संघ का राजनीतिक मंच है और कांग्रेस की नीतियों को परोक्ष रूप से संघ प्रभावित करता रहता है। बसपा संघ को सहयोग करती है और संघ का सहयोग लेती है। ऐसे हालातों में वंचित समुदायों के सामने बहुत बड़ा राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। वंचित समुदायों के लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर वे  किस पार्टी को समर्थन करें? उनको सबसे अधिक गुस्सा बसपा के प्रति है-क्योंकि बसपा बहुजन के नाम पर 85 फीसदी वंचितों के उत्थान की बात करती है और सत्ता के लिये संघ व संघी नीतियों का समर्थन करती है।

वंचित समुदायों में यह धारणा बन चुकी है कि इस वर्ष राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ विधानसभाओं के आम चुनाव होने हैं। जिनमें संघ के इशारे पर बसपा कांग्रेस को हराने के लिये सभी निर्वाचन क्षेत्रों या उन निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारने की योजना बना रही है, जहां कांग्रेस के जीतने की उम्मीद है। जिसका सीधा और साफ मकसद भाजपा को जितना और कांग्रेस को हराना है। ऐसे में वंचित समुदायों के आम लोगों में मायावती और उनकी बसपा के प्रति लगातार गुस्सा बढता जा रहा है।

यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। क्योंकि बसपा के धराशाही होने के बाद निकट भविष्य में कोई तीसरी ताकतवर राष्ट्रीय स्तर की पार्टी उभरने की संभावना नहीं है। अत: वंचित समुदायों की अभी भी चाहत है कि बसपा को बचाया जाये। जिसके लिये पहली शर्त है-मायावती से मुक्ति। मायावती मुक्त बसपा को फिर से जिंदा किया जाये।

मेरा अनुभवजन्य मत है कि यदि मायावती बसपा के सभी पदों को त्याग दे तो बसपा को फिर से जिंदा किया जा सकता है। ऐसा होते ही बसपा के सभी पुराने कर्मठ कार्यकर्ता फिर से सक्रिय हो सकते हैं। इसके अलावा इस महा अभियान के लिये सभी वंचित समुदायों का राष्ट्रीय महासम्मेलन आयोजित करके वंचित समुदायों की संयुक्त विचारधारा, संयुक्त नेतृत्व एवं संयुक्त निगरानी तंत्र विकसित कर लिया जावे तो उक्त तीनों राज्यों में बसपा को किंग मेकर बनने से कोई नहीं रोक सकता। यही नहीं 2019 में बसपा लोकसभा के चुनावों में केन्द्रीय भूमिका का निर्वाह करने की स्थिति में होगी।

यह अलग बात है कि संघ किसी भी कीमत पर बसपा को मायावती के शिकंजे से मुक्त नहीं होने देगा। इसके बावजूद वंचित समुदायों शुभचिंतकों को इस दिशा में गंभीरतापूर्वक परिणामदायी प्रयास करने में कोई हानि नहीं होगी।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/22.05.2018

Wednesday, May 16, 2018

क्या सुप्रीम कोर्ट का रवैया 17वीं शताब्दी में जारी रही न्यायिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना का द्योतक नहीं?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

क्या सुप्रीम कोर्ट का रवैया 17वीं शताब्दी में जारी रही न्यायिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना का द्योतक नहीं?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'



एट्रोसिटी एक्ट पर केन्द्र सरकार की ओर से पेश रिव्यूपिटीशन पर आज 16 मई, 2018 को सुनवाई के दौरान बिना किसी औपचारिक आदेश जारी किये सुप्रीम कोर्ट के जजों का यह कहना (मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार) कि-''किसी की भी गिरफ्तारी निष्पक्ष और उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। अगर बिना निष्पक्ष और ‌उचित प्रक्रिया के किसी को सलाखों के पीछे भेजा जाता है तो समझिए कि हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं। प्रत्येक कानून को जीवन के अधिकार से संबंधित मौलिक अधिकार के दायरे में देखना होगा। इस अधिकार को संसद भी कम नहीं कर सकती।''


यहां मेरे कुछ त्वरित सवाल हैं-

1. सुप्रीम कोर्ट अनेक बार कह चुका है कि अनुच्छेद 21 में जीवन की स्वतंत्रता की आजादी आरोपियों और अपराधियों के लिये अनियंत्रित नहीं है। एक व्यक्ति जो चौराहे पर रिवाल्वर से दनादन गोली चलाना शुरू कर दे तो क्या पुलिस पहले उसकी जांच करेगी या उसे गिरफ्तार करेगी? यदि गिरफ्तार केरेगी और करती भी है। तो फिर अजा एवं अजजा के लोगों के साथ होने वाले घृणित अत्याचार, अमानवीय व्यवहार या एट्रोसिटी एक्ट में वर्णित अपराधों के लिये प्रथम दृष्टया आरोपियों को गिरफ्तार करने करने से पहले जांच करने का प्रावधान क्यों?
2. सुप्रीम कोर्ट एट्रोसिटी एक्ट के तहत अपराध करने वाले प्रथम दृष्टया आरोपियों के अनुच्छेद 21 में वर्णित अधिकारों को संरक्षित करने के लिये कहता है कि 'यदि ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जाता है तो हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं।' उसी सुप्रीम कोर्ट से भारत के तकरीबन 30 फीसदी अजा एवं अजजा वर्गों के लोगों तथा हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के सदस्यों, सहयोगियों और करोड़ों इंसाफ पसंद लोगों की ओर से मेरा सीधा सवाल है कि अजा एवं अजजा के लोगों के विरुद्ध अत्याचार, संत्रास, उत्पीड़न, बलात्कार, हत्या, मल-मूत्र पिलाना एवं खिलाना जैसे घृणित कुकृत्य क्या सुप्रीम कोर्ट की नजर में सभ्य समाज की पहचान हैं?

यदि उक्त बातें सही नहीं तो ऐसे क्रूर, अमानवीय एवं घृणित अपराधों में लिप्त आरोपियों को अनुच्छेद 21 की आड़ में गिरफ्तारी से बचाने के लिये सुप्रीम कोर्ट का यह तर्क कि-'यदि ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जाता है तो हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं।' उचित है और क्या सुप्रीम कोर्ट का यह रवैया अन्याय के शिकार लोगों के प्रति 17वीं शताब्दी में जारी रही न्यायिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना का द्योतक नहीं?


यदि केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने उक्त दोनों तर्क सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश किये होते तो देश को भी ज्ञात हो जाता कि वाकयी भारत सरकार और भारतीय न्यायपालिका वंचितों के कितने हितैषी हैं और सुप्रीम कोर्ट क्या जवाब देता है? जो सवाल वेणुगोपाल नहीं पूछ सके वही सवाल भारत के प्रत्येक मजलूम और मजलमों के सतर्थक तथा इंसाफ पसंद व्यक्ति को पूछने का हक है। मैं इसकी शुरूआत कर रहा हूं, बेशक कीमत कुछ भी चुकानी पड़े?
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111/16.05.2018

Sunday, May 13, 2018

भारत की 90% वंचित आबादी की दुर्दशा तथा कुटने-पिटने और लुटने के कारणों पर नजर डालने की फुर्सत हो तो इस लेख को अवश्य पढ़ें?

*भारत की 90% वंचित आबादी की दुर्दशा तथा कुटने-पिटने और लुटने के कारणों पर नजर डालने की फुर्सत हो तो इस लेख को अवश्य पढ़ें?*


*उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलितों को भागवत कथा सुनने हेतु सार्वजनिक रूप से बैठने पर रोका गया। नहीं रुकने पर मारपीट की गयी। समाचार पत्र की खबर में संविधान को धता बतलाते हुए दलित जाति का उल्लेख किया गया है। पुलिस को तहरीर अर्थात रिपोर्ट नहीं मिली। अतः मामला दर्ज नहीं किया गया। यह खबर अनेक सवाल खड़े करती है:-*

----> 01. यूपी में संघ नियंत्रित भाजपा की सरकार है। संघ-भाजपा का कहना है कि दलित हिंदू हैं। मगर यूपी में भागवत कथा सुनने का हक दलितों को नहीं है।
----> 2. अजा वर्ग के विद्वान लोगों को दलित शब्द लिखे या बोले जाने से घोर आपत्ति होती है। मगर इस खबर में तो दलित जाति का उल्लेख किया गया है। अब क्या होगा?
----> 3. अजा वर्ग/दलित जो आमतौर पर सोशल मीडिया पर खुद को हिंदू नहीं होने का दम भरते हैं। यूपी में चार बार उनकी बसपा की सरकार रह चुकी, फिर भी वे भागवत कथा में जाकर पिट रहे हैं। इसके लिये प्राथमिक जिम्मेदारी किसकी है?
----> 4. खबर में पिटने वालों की पहचान दलित जाति के रूप में सार्वजनिक की गयी है, लेकिन पीटने वालों की पहचान और उनके नाम प्रकाशित तक नहीं किये गये हैं। जिससे प्रिंट मीडिया की निष्पक्षता संदेह के घेरे में है!
----> 5. बसपा के लोगों ने पिटने वाले कथित दलित जाति के लोगों के हालचाल पूछे, लेकिन उनकी ओर से पीटने वालों के खिलाफ तुरन्त रिपोर्ट दर्ज करवाने की कार्यवाही की गयी या नहीं, खबर से कुछ पता नहीं चलता?
----> 6. उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रतिपक्षी बसपा, सपा तथा कांग्रेस जैसे मजबूत राजनीतिक दलों की नाक के नीचे यूपी में संघी हिंदुओं का गुंडाराज कायम है, मगर इन सब दलों की चुप्पी क्या अपराधियों तथा सरकार के अवैधानिक कुकृत्यों को बढ़ावा और परोक्ष समर्थन नहीं दे रही?
----> 7. यूपी में ही भीम आर्मी के पराक्रमी और महाबली लोग भी हैं, जो सारे देश से हिंदू आतंक को समूल मिटाने की बात कहकर आम वंचित लोगों को हिन्दुओं के विरुद्ध उकसाते रहते हैं, मगर उत्तर प्रदेश में ही उनके ही लोग हिंदू धर्म कथा सुनने के मोह में पिट रहे हैं?
----> 8. मूलनिवासी षड्यन्त्र के संचालक तथा आदिवासियों को हमेशा को नेस्तनाबूद करने को आतुर वामन मेश्राम, जो बसपा, कांशीराम तथा अम्बेडकर के कार्यों को भी नेस्तनाबूद करके ब्राह्मणों को विदेशी बोलकर खुद को भारत का इंडीजीनियश घोषित करके भारत के 85% लोगों को शूद्र बतलाकर, अपने आप को संसार का सबसे बड़ा शूद्र हितैषी घोषित करता रहता है। वह भी अपने ही लोगों को हिंदू कथा सुनने से नहीं रोक सका?
----> 9. बहुजन को सर्वजन घोषित करके, बसपा को ब्राह्मणों के यहां गिरवी रख चुकी मायावती 4 बार सत्ता में रहकर भी एक भी ऐसा कानून नहीं बना पाई, जिसके भय से वंचितों की ओर उंगली उठाने वाले गुंडा तत्व थर-थर कांपने लगे? बजाय इसके मायावती ने यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए एट्रोसिटी एक्ट को ही निलंबित कर दिया था। मगर तब बसपा भक्त चुप्पी साधे बैठे रहे!
----> 10. जो सुप्रीम कोर्ट एट्रोसिटी एक्ट के दुरुपयोग की बात कहकर एट्रोसिटी एक को मृतप्रायः घोषित कर चुका है, उस सुप्रीम कोर्ट को यह घटना दिखायी देगी। ऐसी उम्मीद करना वंचितों को खुद को ही धोखे में रखने के समान होगा।
----> 11. ‎एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को गलत कहकर असहमति व्यक्त करने वाली नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार इन घटनाओं के बाद भी वंचितों के हितों की रक्षा हेतु जागेगी, ऐसी उम्मीद कम ही है?
----> 12. ‎अजा एवं अजजा के लिये सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित विधायक और सांसद ऐसी घटनाओं पर लम्बा मौन साध लेते हैं। किसी अज्ञात स्थान पर छिप जाते हैं। ऐसे में संघ नीतियों को लागू करने के लिए ईवीएम की जादूई तकनीक से यूपी के मुख्यमंत्री बनाये गये अकेले योगी को दोष देने से क्या हासिल होगा?
----> 13. ‎यूपीएससी द्वारा क्लास वन का ठप्पा लगा देने के बाद भ्रष्टाचार की गंगोत्री में नहाकर महामानव बन चुके अजा एवं अजजा के ब्यूरोक्रेट्स की पद पर रहते हुए 70 साल की चुप्पी टूटने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। बेशक उनकी बला से समस्त वंचित समुदायों को सार्वजनिक रूप से बेइज्जत क्यों न कर दिया जाए? क्योंकि उन्होंने तो अगली सात पीढ़ियों की सुरक्षा का इंतजाम कर लिया है।
----> 14. ‎आम वंचितों पर हो रहे अत्याचार के लिये, आम व्यक्ति लंबे समय से अंगड़ाई लेते हुए हुंकार भर रहा था। जिसका प्रतिबिम्ब 2 अप्रेल, 2018 को देश और दुनिया ने देखा। मगर हमारे ही गुलाम राजनेताओं ने 2 अप्रेल के नायकों को जेल में बंद करवा दिया। जो आज तक यातना झेल रहे हैं। अनेक तो ऐसे धूर्त हैं, जो इन निर्दोषों को छुड़वाने के कथित प्रयासों के एवज में अपने सिर युद्ध जीतने जैसा सेहरा बंधवा रहे हैं और अंधभक्त जयकारे लगा रहे हैं!
----> 15. ‎हम वंचित समुदाय जिनकी आबादी 90% है, अपने संवैधानिक हकों की रक्षा के बजाय हिंदू धर्म रक्षा में लगे हुए हैं। दिनरात रामायण, भागवत कथा, यज्ञ करवाने में मशगूल हैं। मंदिर बनवा रहे हैं और क्लास वन इन कामों को संवैधानिक हक बताकर बढ़ावा दे रहे हैं। हम भी लगे हुए हैं। लगें भी क्यों नहीं-ब्राह्मण हमारे दिमांग में बैठकर हमें नर्क का भय दिखा रहा है और साथ ही स्वर्ग प्रलोभन दे रहा है!

उपरोक्त दर्दनाक और आत्मघाती हालातों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन लोगों को नक्सलवाद के नाम पर हर दिन मारे जा रहे हजारों निहत्थे आदिवासियों की हत्याओं तथा आदिवासी महिलाओं तथा नाबालिग बच्चियों के साथ जारी बलात्कार की खबरे बेअसर सिद्ध हो रही हैं, उनमें से उत्तर प्रदेश में धर्मकथा सुनते हुए पिटे दलितों की पिटाई की जिम्मेदारी कौन लेगा?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
मो. एवं वाट्सएप: 9875066111, 13.05.2018

*विचार क्रान्ति का मूल सूत्र: उक्त आलेख को पढ़ने के बाद यदि आपकी संवेदना जग जाये और आपके मन में किसी तरह की सांकेतिक या शाब्दिक प्रतिक्रिया व्यक्त करने की साहसिक इच्छाशक्ति बलवती हो तो कृपया यहां मेरे इनबॉक्स में कमेंट नहीं लिखें, बल्कि निम्न लिंक को क्लिक करके तथा विस्तार से अन्य लोगों के कमेंट पढ़कर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया/कमेंट व्यक्त करें। जिससे आपके साहसिक विचारों का हजारों लोगों को पता चल सके। यदि आप चाहते हैं कि आपसे जुड़े फ्रेंड्स भी इस पोस्ट को पढें तो अपनी वाल/ग्रुप पर इसे शेयर करके, अपने फ्रेंड्स को भी इसे आगे शेयर करने को प्रेरित कर सकते हैं। विचार क्रान्ति का यही मूल सूत्र है।*

Friday, May 11, 2018

छद्मभूषणों से विभूषित लोग क्यों कर सोशल-मीडिया-मैदान छोड़ देते हैं?

छद्मभूषणों से विभूषित लोग क्यों कर सोशल-मीडिया-मैदान छोड़ देते हैं?

व्हाट्सएप-फेसबुक-फेक यूनिवर्सिटी के फेक स्कॉलरों के पाठ्यक्रम में इतना मनगठंथ झूठ एण्ड हेट शामिल हो चुका है कि व्हाट्सएप-फेसबुक-सोशल मीडिया के रियल-समर्पित लोग सच लिखते-लिखते थक कर व्हाट्सएप-फेसबुक छोड़ने को विवश हो जाते हैं, लेकिन व्हाट्सएप-फेसबुक-फेक यूनिवर्सिटी के फेक स्कॉलरों का संगठित गिरोह अपना फेक अभियान बंद नहीं करता है।



सोशल मीडिया से जुड़े भारतीय समाज के लिये वाट्सएप-फेसबुक-फेक यूनिवर्सिटी के फेक तथ्यों पर आधारित फेक शोधों के जरिये पीएचडी की फेक उपाधि धारण करने वाले फेक विद्वानों के फेक कारनामों से बचना लगभग असंभव होता जा रहा है।


अपुष्ट सूत्रों का कहना है कि व्हाट्सएप-फेसबुक-फेक यूनिवर्सिटी के फेक स्कॉलरों के इस फेक अभियान के लिये, उन्हें अपने फेक आकाओं की ओर से फेक सपने सपने दिखाये जाते हैं और फेक जरियों से कमाई गयी काली कमाई में से कुछ टुकड़े भी डाले जाते हैं!


यदि कोई साहसी व्यक्ति ऐसे फेक लोगों के संगठित और पेड गिरोह का विरोध करने की रियल हिम्मत जुटाने की कोशिश भी करता है तो उसे वाट्सएप-फेसबुक-फेक यूनिवर्सिटी फेक स्कॉलर, सोशल मीडिया के साथ-साथ अपने-अपने एरिया में भी ऐसे व्यक्ति को असामाजिक, गद्दार, अधार्मिक, अनैतिक, दलाल, देशद्रोही और न जाने किन-किन घटिया-छद्मभूषणों से विभूषित करके इस कदर बदनाम करना शुरू कर देते हैं, कि ऐसे व्यक्ति को सामान्य जीवन जीना तक हराम हो जाता है।


अंतत: इन छद्मभूषणों से विभूषित अधिकतर रियल लोग, फेक लोगों के फेक अभियान के आगे घुटने टेकने या मैदान छोड़ने को विवश हो जाते हैं। सबसे दु:खद पहलु वाट्सएप-फेसबुक-फेक यूनिवर्सिटी का ज्ञान अर्जित करके युवा तथा संस्कारित हो रही वर्तमान पीढी के लिये यह अपूर्णनीय क्षति है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111/11.05.2018, जयपुर

Tuesday, May 8, 2018

संघी षड्यन्त्र-चिंता मत करो, आरक्षण के साथ कोई छोड़छाड़ नहीं कर सकता!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

संघी षड्यन्त्र-चिंता मत करो, आरक्षण के साथ कोई छोड़छाड़ नहीं कर सकता!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

यदि वंचित वर्गों के सुशिक्षित लोगों को इस खुश फहमी में जीने से हमें आनंद मिलता है कि ''आरक्षण के साथ कोई छोड़छाड़ नहीं कर सकता!'' तब तो ऐसे आनंद के बारे में कुछ कहना-सुनना और लिखना निरर्थक है। अन्यथा आरक्षण के बारे में समझने वाले कुछ अति गंभीर चिंताजनक तथ्य हैं। जैसे-

1-सरकारों द्वारा निचले क्रम के 35% आरक्षित पदों का निजीकरण किया जा चुका है। जहां पर कोई आरक्षण नहीं है।

2-राष्ट्रीय स्तर पर अजजा के लिए आरक्षित तकरीबन एक तिहाई (33%) पदों पर अवैध जाति प्रमाण पत्रों के जरिये अनारक्षित लोगों ने गैर-कानूनी तौर पर कब्जा किया हुआ है। जिनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने से केन्द्र सरकार ने यह कहकर असमर्थता जताई है कि ऐसे लोगों के विरुद्ध कार्यवाही करने हेतु सरकार के पास पर्याप्त साधन नहीं हैं। (स्रोत-सीबीआई रिपोर्ट)

3-संविधान के अनुच्छेद 335 की व्याख्या के बहाने पदोन्नति में मिलने वाला आरक्षण न्यायपालिका द्वारा इतना मुश्किल बना दिया गया है, कि उसे जीरो (0) कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं! जिसको केन्द्र सरकार का मौन समर्थन है। इस कारण अनेक छोटे-बड़े लोक सेवकों को पदावनत किया जा चुका है।

4-न्यायपालिका द्वारा मेरिट में आने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को अनारक्षित कोटे से बाहर करने के ढेरों तरीके ईजाद किये जा चुके हैं, जिसके चलते मेरिटधारियों को भी आरक्षित पदों पर समेट दिया गया है। जो सरेआम संविधान की मूल भावना का खुला उल्लंघन है।

5-सदा की भांति वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में नकारात्मक टिप्पणियों के जरिये पदोन्नतियां बड़े पैमाने पर रोकी जा रही हैं तथा बैक लॉग को भरने के लिये कोई संवैधानिक कानूनी प्रक्रिया निर्धारित नहीं है। ऐसे मामलों में आरक्षित वर्ग के उच्च पदस्थ अफसरों का मौन आश्चर्यजनक और संदेहास्पद है!

उपरोक्त हालातों के उपरांत भी लम्बी-चौड़ी बातें करने वाले आरक्षित वर्ग के जनप्रतिनिधि संसद-विधानसभाओं में मौन साधे बैठे रहते हैं तथा सार्वजनिक आयोजनों में आकर डींग हांकते रहते हैं। भोली-भाली जनता को यह कहकर गुमराह करते रहते हैं कि "चिंता मत करो, आरक्षण के साथ कोई छोड़छाड़ नहीं कर सकता।" वास्तव में यही संघी षड्यन्त्र है। राजनेताओं के ऐसे बयानों के आधार पर उनके अंधभक्त तथा उनके पैसों पर पलने वाले पेड राईटर सोशल मीडिया के मार्फ़त तथा अन्य तरीकों से लगातार आम जनता को गुमराह करते रहते हैं।

अतः यदि ऐसे लोगों के बहकावे में आकर खुश फहमी में जीते रहे, तो यह हमारे शिक्षित होने तथा हमारे समसामयिक हालातों के प्रति हमारी समझ पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 9875066111, 08.05.2018

क्या मीणा हिंदुत्व की आड़ में ब्राह्मणों की गुलामी को अंगीकार करने को बेताब हैं?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

क्या मीणा हिंदुत्व की आड़ में ब्राह्मणों की गुलामी को अंगीकार करने को बेताब हैं?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'



दैनिक भास्कर, गंगापुर सिटी, जिला सवाई माधोपुर, राजस्थान के 07 मई, 2018 के अंक में प्रकाशित यह खबर, पूर्वी राजस्थान के समग्र समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक तस्वीर का एक जीता जागता प्रतिबिंब है। जिसे पढ़कर उन लोगों को अवश्य निराशा होगी, जो विशेषकर मीणा आदिवासियों को ब्राह्मणवादी व्यवस्था तथा हिंदुत्व के आत्मघाती शिकंजे से मुक्त देखना चाहते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संसद द्वारा निर्मित एक भी हिंदू विधि आदिवासियों पर लागू नहीं होती है, लेकिन राजस्थान के मीणा आदिवासी हिंदू धर्म के सबसे बड़े पैरोकार और धर्मरक्षक की भूमिका का निष्ठापूर्वक निर्वाह करते हैं। यह अलग बात है कि वैवाहिक मामलों/विवादों का निपटारा करते समय सभी मीणा पूर्णतः अहिंदू आदिवासी बनकर पंचायती निर्णय करके उन्हें लागू करने में पीछे नहीं रहते हैं। संवैधानिक आरक्षण के लिये भी मीणा खुद को शुद्ध आदिवासी सिद्ध करने में पीछे नहीं रहते, जो वे हैं भी, लेकिन गत 3-4 दशक में मीणाओं को संघी पाठशाला के दलालों ने जो कट्टरता तथा हिंदुत्व की अफीम पिलाई है, उसके नशे में डूबकर हिंदुत्व की आड़ में ब्राह्मणों की गुलामी को अंगीकार करने को बेताब लगते हैं! जो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से कम नहीं!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-9875066111, 08.05.2018

Tuesday, May 1, 2018

क्रूर पूंजीवादी व्यवस्था क्रीमी लेयर के बजाय अधिक न्यायसंगत आरक्षण व्यवस्था को अपनाने पर विचार किया जाना समय की मांग है।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

क्रूर पूंजीवादी व्यवस्था क्रीमी लेयर के बजाय अधिक न्यायसंगत आरक्षण व्यवस्था को अपनाने पर विचार किया जाना समय की मांग है।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'


आज श्रम दिवस है। संगठित तथा असंगठित श्रमिक हमेशा से शोषित होते रहे हैं। वर्तमान में सरकारी क्षेत्र में सेवारत लोक सेवक भी श्रमिकों की भांति शोषण के शिकार हैं। इसके बावजूद भी सरकारी सेवाओं में नियुक्ति पाने के लिये हर एक युवा सपने देखता रहता है। मगर कुछ समुदायों द्वारा मीडिया के मार्फत सुनियोजित रूप से यह दुष्प्रचारित किया जाता है कि आरक्षण के चलते योग्य युवाओं को सरकारी सेवाओं में नियुक्ति नहीं मिल पा रही हैं। वहीं दूसरी ओर आरक्षित वर्गों के पिछड़े जाति-समुदायों के गरीब परिवारों के युवाओं में भी इस बात को लेकर आक्रोश बढता जा रहा है कि उनको, उनके ही वर्ग के आगे बढ चुके लोगों के कारण शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाने तथा सरकारी नौकरी पाने में मुश्किलातों का सामना करना पड़ रहा है।


यहां यह तथ्य समझने योग्य है कि संविधान के प्रावधानों के तहत सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े ऐसे नागरिकों के वर्गों को, जिनका प्रशासनिक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, उनके पक्ष में नियुक्ति या पदों को आरक्षित किया जा सकता है। इसी को आम बोलचाल में आरक्षण कहा जाता है। जिसके चलते तुलनात्मक रूप से मेरिट में कम अंक पाने वाले वंचित वर्गों के अभ्यर्थियों को प्रशासनिक सेवाओं में चयनित कर लिया जाता है। यह एक संवैधानिक पक्ष है।


जबकि दूसरा व्यावहारिक पक्ष यह है कि उक्त आरक्षित पदों पर चयनित होकर आरक्षण का लाभ उठा चुके उच्च पदस्थ, उच्च पदों से सेवानिवृत, सुविधा सम्पन्न एवं धनाढ्य लोगों की संतानें ही वर्तमान में अधिकतर आरक्षित पदों पर नियुक्ति पा रही हैं। जिसके पक्ष में कोई आधिकारिक आंकड़े तो नहीं हैं, लेकिन लोक अवधारणा इस विचार की पुष्टि करती है।


इस वजह से आरक्षित वर्गों में शामिल पिछड़े समुदायों के नागरिकों और कम शिक्षित लोगों का मत है कि उनकी संतानों को आरक्षित पदों पर नियुक्ति पाने के अवसर लगभग समाप्त हो चुके हैं।


इस स्थिति के कारण आरक्षित वर्गों के पिछड़े परिवारों/समुदायों के युवाओं में लगातार आक्रोश बढता जा रहा है। विशेषकर इस कारण भी क्योंकि प्रतिनिधित्व के नाम पर आरक्षित पदों पर नियुक्ति पाने वाले आरक्षित वर्गों के अधिकतर उच्च पदस्थ लोक सेवक अकसर अपने वर्गों या अपने वर्गों के लोगों के उत्थान के बजाय अपने निजी ​या पारिवारिक विकास पर ही ध्यान देते रहे हैं।


इसी स्थिति को आधार बनाकर कुछ आरक्षण विरोधी समुदाय एवं आरक्षित वर्गों के ऐसे लोग जो प्रतिनिधित्व की संवैधानिक अवधारणा को ठीक से नहीं समझते हैं-क्रीमीलेयर की असंवैधानिक मांग का समर्थन करते देखे जा सकते हैं। जिसको मेरे जैसे संविधानवादी लोग उचित नहीं मानते हैं। अत: अभी तक इस मांग को सफलता नहीं मिल सकी है।


दूसरी ओर अजा एवं अजजा वर्गों में क्रीमी लेयर हो या नहीं? इस विषय को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनेकों बार नकारे जाने के बाद भी वर्तमान आरक्षण विरोधी भाजपा के सत्तारूढ होने के बाद अजा एवं अजजा वर्गों में क्रीमी लेयर हो या नहीं विषय पर सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है। जिसको संघ सहित सभी कट्टर हिंदुवादी संगठनों का समर्थन मिल रहा है। दबे मन से आरक्षित वर्गों के पिछड़े/वंचित परिवारों/समुदायों के युवाओं का भी इस को समर्थन मिल रहा है।


इन हालातों में मुझे ऐसा लगता है कि अजा एवं अजजा वर्गों के युवाओं में व्याप्त असंतोष के चलते न्यायपालिक के मार्फत क्रीमी लेयर लागू किये जाने की आशंका को निरस्त करने के बजाय, असंतोष के कारणों पर समय रहते वंचित वर्गों को खुलकर समाधानकारी विचार करने की जरूरत है और इस असंतोष को दबाने के बजाय, जिसे दबाना असंभव है, युवाओं की समस्याओं तथा भावनाओं को समझकर उचित एवं न्यायसंगत समाधान निकाला जाये। क्योंकि क्रीमी लेयर जैसी क्रूर पूंजीवादी आरक्षण व्यवस्था के लागू होने के संकट से बचने के लिये कोई अन्य न्यायसंगत संवैधानिक तथा अजा एवं अजजा वर्गों के हितों को अधिक संरक्षण प्रदान करने वाली आरक्षण व्यवस्था को अपनाने पर विचार किया जाना समय की मांग है।


इस विषय में मेरी दृष्टि में एक संवैधानिक समाधान है, जिसका खुलासा आक्रोशित एवं व्यथित अनुभव कर रहे आरक्षित वर्ग के युवाओं की उपस्थिति में उचित समय पर सार्वजनिक रूप से किया जायेगा। लेकिन मैं यह उचित समझता हूं कि इससे पहले इस विषय पर सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर विचार विमर्श, चिंतन और तर्क-वितर्क होना बहुत जरूरी है।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 9875066111, 01.05.2018

Thursday, April 19, 2018

हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन की ओर से राष्ट्रपति President, प्रधानमंत्री तथा समस्त मुख्यमंत्री के नाम 'अनुच्छेद 16 (4) के तहत प्रदत्त आरक्षित वर्गों के हकों को छीनने वाली और अनारक्षितों को लाभ पहुंचाने वाली रोस्टर प्रणाली पर तुरंत रोक लगवाने के सम्बन्ध में हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन की ओर से ज्ञापन-पत्र।'

हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन की ओर से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा समस्त मुख्यमंत्री के नाम 'अनुच्छेद 16 (4) के तहत प्रदत्त आरक्षित वर्गों के हकों को छीनने वाली और अनारक्षितों को लाभ पहुंचाने वाली रोस्टर प्रणाली पर तुरंत रोक लगवाने के सम्बन्ध में हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन की ओर से ज्ञापन-पत्र।'




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प्रेषक: राष्ट्रीय प्रमुख, हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन (भारत सरकार की विधि अधीन दिल्ली से रजिस्टर्ड राष्ट्रीय संगठन R. No.: ROS/North/452/2015), राष्ट्रीय प्रमुख का कार्यालय: 7 तंवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006, राजस्थान, 9875066111, दिनांक: 19.04.2018


ज्ञापन-पत्र दिनांक: 19.04.2018
प्रतिष्ठा में,

राष्ट्रपति, भारत सरकार, राष्ट्रपति भवन, नयी दिल्ली-110001
विषय: अनुच्छेद 16 (4) के तहत प्रदत्त आरक्षित वर्गों के हकों को छीनने वाली और अनारक्षितों को लाभ पहुंचाने वाली रोस्टर प्रणाली पर तुरंत रोक लगवाने के सम्बन्ध में हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन की ओर से ज्ञापन-पत्र।

माननीय महोदय,

उपरोक्त विषय एवं संदर्भ में आपका ध्यान आकृष्ट करके हक रक्षक दल सामाजिक संगठन के देशभर में सेवारत लाखों समर्थकों, सहयोगियों तथा सदस्यों की ओर से आपको अवगत करवाया जाता है कि—

1 यह कि सर्वज्ञात है कि भारत में हजारों सालों से अमानवीय विभेदक व्यवस्था के लागू रहने के कारण भारत की तकरीबन 90 फीसदी आबादी अपने हक-हकूक से वंचित हो गयी थी। इस कारण संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में प्रावधान किया था कि जिन वर्गों का सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, उनके लिये नियुक्तियों में पदों का आरक्षण किया जा सकेगा।

2. यह कि समाज में समानता की स्थापना हेतु उक्त संवैधानिक व्यवस्था को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अनेकानेक मामलों में पिछड़े वर्गों के लिये जरूरी एवं न्यायसंगत घोषित करते हुए इस प्रकार से लागू करने के निर्देश दिये, जिससे कि आरक्षित वर्गों को लोक सेवाओं में निर्धारित अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।

3. यह कि उपरोक्त बिंदु 1 एवं 2 के तहत तकरीबन 6 दशक से जारी आरक्षण व्यवस्था को वर्तमान केन्द्र सरकार के सत्तारूढ होने के बाद न्यायिक निर्णयों की अनुपालना के बहाने इस प्रकार से लागू किया जा रहा है, जिसके चलते संविधान द्वारा प्रदत्त सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व का मूल अधिकार मृतप्राय हो चुका है।

4. यह कि केन्द्रीय एवं प्रादेशिक सरकारों द्वारा लोक सेवाओं में चयन के लिये गत 6 दशकों से चली आ रही चयन एवं पदोन्नति प्रणाली को दरकिनार करते हुए रोस्टर प्रणाली की आड़ में आरक्षित वर्गों के लिये निर्धारित आरक्षित पदों को परोक्ष रूप से कम या समाप्त किया जा रहा है।

5. यह कि उपरोक्त रोस्टर प्रणाली के आधार पर लोक सेवाओं में चयन हेतु जारी सरकारी विज्ञप्तियों का यदि आप अवलोकन करेंगे तो प्रथम दृष्टया (Prima facie) पायेंगे कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) की भावना के अनुसार आरक्षित वर्गों को प्रदत्त प्रतिनिधित्व का मूल अधिकार रोस्टर की आड़ में दुराशयपूर्वक सरकारी स्तर पर समाप्त किया जा रहा है।

6. यह कि उपरोक्तानुसार आरक्षित वर्गों के लिये संविधान के अनुसार प्रतिनिधित्व प्रदान करने के मूल अधिकार की रोस्टर प्रणाली के बहाने की जा रही चयन/नियुक्तियों एवं पदोन्नतियों में वर्गीकरण के नाम पर सरकार द्वारा आरक्षित वर्गों के संवैधानिक हकों को सरेआम छीना जा रहा है। पश्चिमी बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार, एआईआर, 1952, के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकार के मनमाने वर्गीकरण को कुटिल विभेद (Devious Classification) की संज्ञा दी है।

7. आग्रह एवं अपेक्षा: उपरोक्त बिंदु 1 से 6 में वर्णित तथ्यों के अनुसार जारी सरकारी मनमानी के विरुद्ध वंचित समुदायों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की आश्चर्यजनक चुप्पी एवं अधिकारी—कर्मचारी विभागीय संगठनों में व्याप्त सरकारी भय के कारण इस अत्यंत संवेदनशील मामले को सीधे आपके समक्ष प्रस्तुत करके आपको अवगत करवाया जाना हमारी मजबूरी है। क्योंकि इन हालातों में आरक्षित वर्गों की योग्य युवा प्रतिभाओं को सरकारी सेवाओं में नियुक्ति मिलने एवं पहले से सेवारत लोक सेवकों के पदोन्नति के हक छीने जाने के कारण देश की बहुसंख्यक वंचित आबादी में निरंतर असंतोष एवं गुस्सा बढता जा रहा है। विशेषकर इसलिये भी क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार इस अत्यधिक गंभीर संवैधानिक विभेद को रोकने के बजाय, इसे बढावा दे रही है। जो विश्व के सबसे बड़े भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिये अशुभ संकेत है। अत: कृपया भारतीय संविधान के संरक्षक के रूप में हस्तक्षेप करते हुए उपरोक्त मनमानी एवं आरक्षित वर्गों के हितों को क्षति कारित करने वाली असंवैधानिक रोस्टर प्रणाली पर तुरंत प्रतिबंध लगवाने का कष्ट करें। जिससे संविधान एवं इंसाफ की गरिमा को कायम रखकर वंचित वर्गों की लोकतंत्र में अटूट आस्था तथा संवैधानिक विश्वास को जिंदा रखा जा सके।

प्रतिलिपि: उपरोक्तानुसार उचित संवैधानिक दायित्वों का निष्पादन करने हेतु प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नयी दिल्ली एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अग्रिम प्रेषित है।

भवदीय


(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा)
राष्ट्रीय प्रमुख



आरक्षितों की दक्षता तथा योग्यता पर प्रश्न खड़े करने वाले संविधान निर्माता वंचितों के कितने हितैषी रहे होंगे?

आरक्षितों की दक्षता तथा योग्यता पर प्रश्न खड़े करने वाले संविधान निर्माता वंचितों के कितने हितैषी रहे होंगे?

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
वर्तमान में और विशेष रूप से भाजपा की नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्तारूढ होने के बाद से सरकारी सेवाओं में आरक्षण के आधार पर नियुक्ति पाने वाले लोक सेवकों को अयोग्य तथा अक्षम करार देने के लिये देशभर में अनेक तरह के उचित-अनुचित प्रयास संचालित हैं। जिससे आरक्षित वर्ग के लोक सेवकों को हर समय भारी मानसिक आघात एवं दबाव झेलना पड़ता है। इस बारे में मेरा ऐसा मानना है कि खुद संविधान निर्माताओं द्वारा मूल संविधान में कुछ नकारात्मक प्रावधानों को शामिल किये जाने के कारण ही अनारक्षित समुदायों के लोग आरक्षित वर्गों के लोक सेवकों के विरुद्ध मीडिया के सहयोग से उक्त प्रोपेगंडा को आगे बढाने में सफल हो पा रहे हैं:-

पहला प्रावधान-पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य/सरकार की राय में सरकारी सेवाओं में 'यदि पर्याप्त नहीं है, तो उनको नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिये प्रावधान बनाये जा सकेंगे।'

दूसरा प्रावधान-केन्द्र और प्रदेश सरकारों की सेवाओं में अजा एवं अजजातियों के सदस्यों की 'नियुक्तियां करते समय प्रशासन की दक्षता बनाये रखने का ध्यान रखा जायेगा।'

उक्त दोनों प्रावधान हजारों सालों से वंचित समुदायों को प्रशासन में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के मकसद से अफर्मेटिव एक्शन (Affirmative Action or Positive Discrimination-An action or policy favoring those who tend to suffer from discrimination, especially in relation to employment or education) के रूप में समाविष्ट किये गये थे, लेकिन इनको नकारात्मक तरीके से शामिल किया गया। जिसके कारण इन दोनों प्रावधानों के आधार पर न्यायपालिका द्वारा इनकी लगातार नकारात्मक व्याख्या की जाती रही हैं। न्यायपालिका की नकारात्मक व्याख्या के आधार पर अनारक्षित वर्गों में नकारात्मक जनमत निर्मित हुआ है।

उक्त दूसरा प्रावधान सीधे-सीधे संविधान निर्माताओं का संकेत था कि दक्षता के नाम पर अजा एवं अजजा वर्गों के लोगों को प्रशासन में नियुक्ति/पदोन्नति प्रदान करने की राह में रोड़ अटकाया जा सके। इसी संवैधानिक आधारभूमि में न्यायपालिता संविधान तथा कानून की व्याख्या के नाम पर 1951 से 2018 तक आरक्षित वर्गों के लोक सेवकों की नियुक्तियों तथा पदोन्नतियों में नये-नये आदेश पारित करके सामाजिक न्याय एवं प्रतिनिधित्व के हक को बाधित करती आ रही है।

इसके बावजूद वंचित वर्ग और विशेषकर अजा वर्ग के कुछ ऐसे लोग, जिन्होंने शायद कभी संविधान की शक्ल तक नहीं देखी होगी, हर दिन दावा करते रहत हैं कि वंचित वर्गों के हित संरक्षण में बनाया गया भारत का संविधान दुनिया का सर्वश्रृेष्ठ संविधान है!

इन लोगों द्वारा संविधान को इतना महिमांडित किया जाता रहा है कि संविधान के उपरोक्त वर्णित नकारात्मक प्रावधानों पर वंचित समुदायों के आमजन के बीच विमर्श ही नहीं हो पाया।

वंचित समुदायों के सामाजिक एवं राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ-साथ, कानूनविदों ने भी उक्त सकारात्मक के नाम पर बनाये गए, नकारात्मक प्रावधानों के कड़वे सच को आम लोगों के सामने लाने के बजाय, दुनिया का सर्वश्रृेष्ठ संविधान कहने वाले अंधभक्तों की हां में हां मिलते हुए संविधान का महिमामंडन करना ही उचित समझा। जो अब आत्मघाती सिद्ध हो रहा है।

यहां स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि देश की वंचित आबादी की दक्षता तथा योग्यता पर संविधान लागू होने के दिन से ही प्रश्न खड़े करने वाले संविधान निर्माता वंचित वर्ग के कितने हितैषी रहे होंगे?

उक्त दोनों प्रावधानों के अनुच्छेद जानबूझकर इंगित नहीं किये हैं। जिन्हें न्यायिक निर्णयों सहित विस्तारित लेख में अंकित किया जायेगा। मुझे उम्मीद है कि निष्पक्ष संवैधानिक समझ रखने वाले इंसाफ पसंद विद्वजन इस गंभीर संवैधानिक स्थिति पर गहन, गंभीर-चिंतन और विमर्श करेंगे!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111/19.04.2018

Monday, April 9, 2018

भारत बंद: आरक्षण (reservation) पर बामण का सवाल और आदिवासी का जवाब!

भारत बंद: आरक्षण (reservation) पर बामण का सवाल और आदिवासी का जवाब!
(बामण का सवाल-"अयोग्य SC-ST को नौकरी क्यों?" और आदिवासी डॉ. पुरुषोत्तम मीणा का सीधा जवाब!)

हार्ड वेयर की दुकान के मालिक एक बामण से आज सुबह (09.04.018) 10 अप्रेल, 18 के प्रस्तावित हवा-हवाई भारत बंद पर चर्चा शुरू हो गयी, तो बात आरक्षण पर आकर टिक गयी। जो जनहित में सार्वजनिक की जा रही है।


बामण का पहला सवाल: मीणा जी 2020 में रिजर्वेशन खत्म हो जायेगा, उसके बाद आप लोग क्या करोगे?

मैं: क्या मतलब?

बामण: जब रिजर्वेशन खत्म हो जाएगा तो आप लोगों को नौकरी तो मिलेगी नहीं फिर क्या करोगे?

मैं: रिर्जवेशन कौन खत्म कर रहा है?

बामण: 2020 में अपने आप खत्म हो रहा है। खत्म करने की जरूरत ही क्या है? मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत में रिजर्वेशन और मुसलमानों का क्या काम?

मैं: आप रिजर्वेशन के बारे में कितना जानते हैं?

बामण: 40 साल से राजस्थान पत्रिका जैसे प्रतिष्ठित न्यूज पेपर का पाठक हूँ। पत्रिका रिजर्वेशन के बारे में अनेक बार सटीक लेख तथा खबर छापता रहता है। अतः मुझे पूरा ज्ञान है। शुरू में अम्बेडकर ने रिजर्वेशन 10 साल के लिये लिख दिया था। जिसे वोट के चक्कर में कांग्रेस बढ़ाती रही। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने भी हिंदुओं से गद्दारी कर के बढ़ा दिया। जिसकी वो सजा भुगत रहा है।

मैं: आपने कभी संविधान की शक्ल देखी है?

बामण: नहीं।

मैं: एक बार संविधान खरीद कर पढ़ना फिर चर्चा करेंगे। जहां तक पत्रिका की प्रतिष्ठा, विश्वसनीयता और निष्पक्षता का सवाल है तो आपको पत्रिका के सम्पादक के साथ दिनांक: को मोबाइल पर हुई मेरी बातचीत सुनाता हूँ। जिसे सुनकर आपको पत्रिका की संवैधानिक समझ, समझ में आ जायेगी। 

(यह कहकर मैंने उनको ऑडियो सुना दिया) उक्त पोस्ट में संदर्भित राजस्थान पत्रिका के संपादक के साथ हुई मेरी बातचीत के आॅडियो का लिंक प्रस्तुत है। आप चाहें तो ऑडियो सुन सकते हैं:

https://www.youtube.com/watch?v=eNc-HY4ryN4

बामण: हो सकता है, गलती हो गयी हो, लेकिन यह बताओ कि हमारे इंटेलिजेंट बच्चों को 70% पर भी नौकरी नहीं मिलती हैं और एससी-एसटी के अयोग्य लोगों को 30% पर नौकरी दे दी जाती है। क्या यह न्याय है?

मैं: शर्मा जी आप कितने भाई हो, कितने पढ़े हो और क्या-क्या करते हो?

बामण: बड़े भाई बीए पास हैं और तहसीलदार हैं। उनसे छोटे वाले एमए हैं और लेक्चरर हैं। मैं 10वीं तक पढा हूँ और हार्ड वेयर की दुकान करता हूँ। मुझ से छोटा विकलांग है। वह 8वीं तक पढा है। वह कपड़े की दुकान करता है एवं साथ ही पुरोहिताईं का काम करता है।

मैं: शर्मा जी क्या आपके पिताजी ने अपनी और पैतृक अचल संपत्ति का आप चारों भाइयों में विभाजन कर दिया? यदि हाँ तो विभाजन कैसे-कैसे हुआ?

बामण: जी कर दिया। मकान के बराबर 4 हिस्से कर दिए और 60 बीघा जमीन 15-15 बीघा बांट दी। 4 प्लाट थे। चारों को 1-1 दे दिये। जयपुर से बाहर एक जमीन थी, जिसको बेचकर राशि का बराबर विभाजन हो गया। लेकिन इसका रिजर्वेशन से क्या ताल्लुक है?

मैं: शर्मा जी, क्या आप चारों भाई, शैक्षणिक और बौद्धिक दृष्टि से एक समान हो?

बामण: नहीं। दो तो हाई एज्यूकेटेड हैं। हम दो कामचलाऊ पढ़े-लिखे हैं।

मैं: शर्मा जी अब मुझे बताओ-आप चारों भाई योग्यता में एक जैसे नहीं हो। एक तो विकलांग भी है। फिर आपके पिताजी ने चारों भाइयों के मध्य सम्पत्ति की समान हिस्सेदारी क्यों की? आपके दो अधिक योग्य भाइयों को अधिक हिस्सा क्यों नहीं दिया?

बामण: मीणा जी ऐसा थोड़े ही होता है? बाप-दादा की संपत्ति में तो सबको बराबर हिस्सा मिलना ही चाहिए। बल्कि हम दोनों भाइयों को तो ज्यादा हिस्सा मिलना चाहिये था, क्योंकि नौकरी वालों के पास तो कोई कमी नहीं, लेकिन पुश्तैनी सम्पत्ति का बराबर हिस्सा मिल गया।

मैं: शर्मा जी यह भारत देश हर एक भारतीय का है। चाहे कोई भारतीय पढा हो या नहीं। अनपढ़ हो या कलेक्टर, भारत की सम्पूर्ण सम्पत्ति, व्यवस्था, सत्ता तथा प्रशासनिक मशीनरी में हम सबका समान हिस्सा है। जो हम सबका नेच्युरल तथा संवैधानिक राईट है।

लेकिन आप लोगों के पूर्वजों ने हजारों सालों से एससी, एसटी तथा ओबीसी के लोगों का हिस्सा छीनकर जबरन कब्जाया हुआ था। जिसे आगे कब्जाने से रोकने के लिये संविधान में नौकरियों के कुछ पदों आरक्षण किया हुआ है। जो कभी भी नहीं बढ़ाया गया। आरक्षण स्थायी संवैधानिक मूल अधिकार है। जिसे आपका मोदी खत्म करना तो दूर खत्म करने के नाम पर छू भी नहीं सकता। अभी तो रिजर्वेशन को 49 से 85-90% तक बढाया जाना है। तब जाकर हम सभी भारतीयों के साथ इंसाफ होगा।

इसके अलावा भी बहुत कुछ शर्मा जी को समझाया। अंत में सिर खुजाते हुए शर्मा जी बोले मीणा जी छोड़ो इन बातों को अपने को भारत बंद से क्या लेना देना। ऊपर से ऑर्डर आता है तो हाँ कहने में क्या जाता है? थोड़ी देर और बैठो चाय मंगाता हूँ। उनकी चाय का प्याला उनको मुबारक। मेरे इंसाफ पसन्द MOST/वंचित समुदायों के लोगों को यह चर्चा मुबारक। उपयोगी लगे तो इसका जनहित में उपयोग करें।

मेरा ऐसा अनुभवजन्य मत है कि यदि हमें वाकयी नाइंसाफी से मुक्ति के साथ-साथ संवैधानिक व्यवस्था में समान भागीदारी चाहिये तो हमें:-

1. अपने अहंकार, आग्रह, पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत अंधभक्ति को त्यागना होगा।

2. देश के सभी वंचित समुदायों/MOST (M4Minority + O4OBC + S4SC + T4Tribals) को मिलकर संयुक्त विचारधारा, संयुक्त नेतृत्व और संयुक्त निर्णय तथा निगरानी तंत्र विकसित करना होगा।

3. इसके अलावा हमारी वर्तमान पीढी को तथ्यपरक सामयिक जानकारी तथा अधिकृत संवैधानिक ज्ञान के साथ-साथ साहसिक वकृत्वकला में भी निपुण बनना/बनाना होगा।

*हमारा मकसद साफ।*
*सभी के साथ इंसाफ।*
*जय भारत। जय संविधान।*
*नर-नारी, सब एक समान।।*
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111/09.04.2018
*नोट: HRD-News Letter-MOST VOICE प्राप्त करने के लिये WA No.: 9875066111 पर अपना नाम, पता एवं परिचय लिखकर भेजें।*

Thursday, April 5, 2018

हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन की ओर से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, समस्त राज्यपाल, मुख्यमंत्री के नाम 10% अनारक्षितों का प्रस्तावित असंवैधानिक (Unconstitutional) भारत बंद दि.: 10.04.2018 को रोकने हेतु संज्ञान लेने के संबंध में ज्ञापन।'

हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन की ओर से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, समस्त राज्यपाल, मुख्यमंत्री के नाम 10% अनारक्षितों का प्रस्तावित असंवैधानिक (Unconstitutional) भारत बंद दि.: 10.04.2018 को रोकने हेतु संज्ञान लेने के संबंध में ज्ञापन।'

प्रेषक: राष्ट्रीय प्रमुख, हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन (भारत सरकार की विधि अधीन दिल्ली से रजिस्टर्ड राष्ट्रीय संगठन R. No.: ROS/North/452/2015), राष्ट्रीय प्रमुख का कार्यालय: 7 तंवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006, राजस्थान, 9875066111, दिनांक: 31.03.2018


प्रेषिति: राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री-भारत सरकार, नयी दिल्ली। मुख्य न्यायाधीश तथा समस्त न्यायाधीश-सुप्रीम कोर्ट, नयी दिल्ली। समस्त राज्यपाल/ मुख्यमंत्री/मंत्री-समस्त राज्य सरकार एवं समस्त मुख्य न्यायाधीश तथा समस्त न्यायाधीश-समस्त हाई कोर्ट।


विषय: भारत के संविधान की रक्षा हेतु अपने-अपने संवैधानिक अधिकारों और दायित्वों का निर्वहन/उपयोग करने के संबंध में आम जन की ओर से आह्वानात्मक ज्ञापन-पत्र।

संदर्भ: मीडिया की खबरों के अनुसार 90% वंचित वर्गों को संविधान द्वारा प्रदत्त 49.5 आरक्षण के विरुद्ध 10% अनारक्षितों का प्रस्तावित असंवैधानिक भारत बंद दि.: 10.04.2018.


समस्त माननीय महोदय/महोदया,


उपरोक्त विषय एवं संदर्भ में मीडिया एवं प्रचार-प्रसार के उपलब्ध सभी साधनों के माध्यम से भारत के 90% वंचित समुदायों की ओर से राष्ट्रहित में आप सभी का ध्यान आकृष्ट कर आप सभी को हालातों से अवगत करवाया जाना जरूरी हो गया है। कृपया बिंदुवार (Point wise) अवलोकन करें:-
  • 1 यह कि भारत का संविधान भारत का सर्वोच्च विधान है। जिसके पालन की शपथ ग्रहण करने के बाद ही आप सब अपने-अपने पदों पर आसीन हैं। अत: संविधान का पालन और क्रियान्वयन आप सभी का अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है। इस माने में आप सभी संविधान के रक्षक भी हैं।
  • 2 यह कि आप सभी को ज्ञान है कि भारत के 90% वंचित समुदायों को सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिये संविधान के भाग 3 में मूल अधिकार के रूप में प्रतिनिधित्व का मूल अधिकार प्रदान किया गया है। जिसके लिये सरकार द्वारा कुछ प्रतिशत प्रशासकीय पदों को आरक्षित किया जाता है। मगर दु:खद कड़वा सच यह है कि संविधान की इस भावना को अभी तक पूर्ण नहीं किया जा सका है।
  • 3 यह कि मीडिया के माध्यम से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार उक्त बिंदु 2 में यथाउल्लेखित प्रावधानों को समाप्त करके/करवाके 90% वंचित वर्ग के संवैधानिक अधिकारों को हमेशा-हमेशा को छीनकर, उन्हें गुलाम बनाये रखने के लिये भारत की व्यवस्था पर बलात काबिज भारत के 10% अनारक्षित लोगों की ओर से 10 अप्रेल, 2018 को प्रस्तावित भारत बंद का आह्वान किया गया है। जो अपने आप में एक अनैतिक और असंवैधानिक कृत्य है। साथ ही साथ ऐसा करना भारत के संविधान का खुला अपमान और तिरस्कार भी है।
  • 4 यह है कि उपरोक्त बिंदुओं में उल्लेखानुसार 10 अप्रेल, 2018 को प्रस्तावित भारत बंद संविधान को चुनौती देने के समान है। संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध लोगों को भड़काकर संविधान का मखौल उड़ाने के समान है। यदि ऐसा होने दिया जाता है तो यह न मात्र भारत के संविधान के विरुद्ध होगा, बल्कि संविधान निर्माताओं की उदार भावनाओं और भारत की संसदीय लोकतांत्रित व्यवस्था का भी खुला अपमान होगा। अत: इस प्रस्तावित असंवैधानिक भारत बंद को रोकने की जिम्मेदारी संविधान की शपथ ग्रहण करने वाले आप सभी पदासीन/पीठासीन संविधान रक्षकों की है।
  • 5 यह कि यदि संविधान के विरुद्ध प्रस्तावित भारत बंद को तुरंत रोका नहीं गया तो भारत के 90% लोगों का भारत के संविधान, लोकतंत्र तथा संसदीय शासन व्यवस्था के साथ-साथ स्वतंत्र न्यायपालिका से भी विश्वास उठ जायेगा। जो हमारे देश के वर्तमान और भविष्य के लिये अपूर्णनीय क्षतिकारक सिद्ध होगा।
आग्रह एवं अपेक्षा
अत: उपरोक्तानुसार तथ्यों एवं हालातों से अवगत करवाकर वंचित वर्गों के हितों के लिये सेवारत हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के देशभर में सेवारत लाखों समर्थकों, सहयोगियों तथा सदस्यों की ओर आप सभी से सार्वजनिक रूप से आग्रह है कि आप सभी अपने-अपने संवैधानिक दायित्वों और अधिकारों का समय रहते संवैधानिक तरीके से निर्वहन करते हुए 10 अप्रेल, 2018 को प्रस्तावित अ संवैधानिक भारत बंद को तुरंत रोकने के आदेश जारी करके भारत की 90% वंचित आबादी के संवैधानिक हकों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करें। जिससे संविधान के साथ-साथ आप सभी के पदों की संवैधानिक गरिमा और निष्पक्षता भी कायम रह सके साथ ही वंचित वर्गों की लोकतंत्र में अटूट आस्था तथा संवैधानिक विश्वास को जिंदा रखा जा सके।
भवदीय
(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा)
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111/05.04.2018

Tuesday, April 3, 2018

ओबीसी-मुसलमानों पर जयभीम-नमोबुद्धाय थोपना तथा हिंदू धर्म को गाली देना वंचितों की एकता में बाधक!

ओबीसी-मुसलमानों पर जयभीम-नमोबुद्धाय थोपना तथा हिंदू धर्म को गाली देना वंचितों की एकता में बाधक!





मैं लम्बे समय से अनुसूचित जाति वर्ग के नेतृत्व को लगातार निम्न विषयों को समझाता आ रहा हूं:-

  • 1 सामाजिक न्याय की प्राप्ति हेतु हिंदू धर्म और हिंदू धर्म प्रतीकों को गाली देने वाले लोगों के साथ कोई भी समझदार कभी नहीं जुड़ना चाहेगा।
  • 2 हिंदू धर्म को गाली देने और बुद्ध धर्म को अधिरोपित करना सामाजिक न्याय के लिये जरूरी एकता में बाधक है।
  • 3 अजा वर्ग के लोगों को बंद कमरे में बुलाकर भारत की 85 फीसदी आबादी को शूद्र बतलाने से 85 फीसदी लोग शूद्र नहीं हो सकते।
  • 4 कथित डीएनए की आड़ में 85 फीसदी लोगों को शूद्रवंशी बतलाकर 'मूलनिवासी' का झूठ गढने से 85 फीसदी आबादी आबादी को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता।
  • 5 संयुक्त संगठनों/दलों के नीति-नियंता पदों पर संख्याबल की दृष्टि से अजा वर्ग की छोटी जातियों, ओबीसी, आदिवासी और मुसलमानों को नेतृत्व करने के अवसर दिये बिना इनके सहयोग की अपेक्षा करना दिन में सपने देखने जैसा है।
  • 6 बुद्धिष्टों के वंशजों के पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त बहुजन शब्द से आदिवासी, ओबीसी और मुसलमान को एकजुट नहीं किया जा सकता।
  • 7 संयुक्त संगठनों/दलों के आयोजनों में भीम वंदना और बुद्ध वंदना करवाना ओबीसी, आदिवासी एवं मुस्लिम एकता में बाधक है।
  • 8 सामाजिक न्याय के मिशन को अम्बेड़कर मिशन घोषित करना और अम्बेड़कर मिशन को बुद्धिष्ट मिशन घोषित करना ओबीसी, आदिवासी एवं मुस्लिम को दूर भगाने जैसा है।
  • 9 सभी आयोजनों में भीम और बुद्ध का गुणगान करना, लेकिन संविधान के ज्ञान से लोगों को महरूम रखना सामाजिक न्याय की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है।
  • 10 ओबीसी, मुस्लिम और आदिवासी से वैवाहिक सम्बन्ध कायम करने की उम्मीद करना एकता में बाधक है।
  • 11 हिंदु धर्म को गाली देकर भी मंदिरों प्रवेश पाने और पुजारी बनने की आकांक्षा रखने वाले नेतृत्व के साथ कौन जुड़ना चाहेगा? इत्यादि।

लेकिन खेद का विषय है कि संयुक्त संगठनों/दलों पर अनैतिक रूप से काबिज नेतृत्व द्वारा उपरोक्त तथ्यों पर विचार करके जरूरी सुधार करने के बजाय अम्बेड़करवाद के नाम पर एक पक्षीय नीतियों, हिंदू विरोध तथा कट्टरता को बढावा दिया गया। लेकिन परिणाम क्या हुआ? कुछ नहीं। अजा, अजजा, ओबीसी एवं मुसलमानों हक लगातार छीने जा रहे हैं। सामाजिक न्याय की अवधारणा को लगातार नुकसान पहुंचाया गया। अम्बेड़करवाद के नाम पर नेतृत्व करने का दावा करने और सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने का नाटक करने वाले अजा वर्ग के कथित मिशनरी अंदरखाने सामाजिक न्याय के दुश्मनों से मिले हुए हैं। सरकारी सेवाओं में अजा एवं अजजा को प्राप्त प्रशासनिक प्रतिनिधित्व हेतु पदों के आरक्षण को लगभग नष्ट किया जा चुका है। ओबीसी के लिये उच्च शिक्षण संस्थानों के दरवाजे लगभग बंद कर दिये गये हैं।


इस सबके बाद भी हिंदू धर्म एवं हिंदू धर्म के प्रतीकों का लगातार तिरस्कार अजा वर्ग का प्रथम लक्ष्य बनता जा रहा है। ऐसे में अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट द्वारा संशोधित कर दिये जाने के बाद 2 अप्रेल, 2018 को स्वस्फूर्त भारत बंद के दौरान भी अजा वर्ग के लोगों द्वारा धार्मिक प्रतीकों का अपमान करने एवं धार्मिक निंदा करने वाला विकृत चेहरा सामने आ गया। जिससे एक ओर तो अजा, अजजा एवं ओबीसी वर्गों की धार्मिक भावनाएं बुरी तरह से आहत हुई हैं। वहीं दूसरी ओर संघ-भाजपा द्वारा हिन्दुत्व के नाम पर कथित उच्च जातियों के साथ ओबीसी को मिलाकर अजा एवं अजजा की घेराबंदी करने का प्रयास किया जा रहा है।


इन हालातों में वर्तमान समय की मांग और कड़वी सच्चाई है कि यदि भारत के बहुसंख्यक वंचित/MOST (M4Minority + O4OBC + S4SC + T4Tribals) समुदायों में यदि जीवंत तथा स्थायी वैचारिक एकता स्थापित नहीं हुई तो बकवास/BKVaS (B4Brahaman* + K4Kshatriya* + Va4Vaishya* + Sanghi*) वर्ग (*जो जन्म आधारित श्रृेष्ठता में विश्वास करते हैं।), वंचित समुदायों को दलित (दलित बनाम दलित), आदिवासी (आदिवासी बनाम आदिवासी), ओबीसी (ओबीसी बनाम ओबीसी) हिस्सों में विभाजित करके खंड-खंड कर देगा और अंत में संघ के अधीन लाकर हिंदुत्व के नाम पर मुस्लिमों के विरुद्ध खड़ा कर देगा। यही नहीं इन सभी को नरक के भय से मुक्ति और स्वर्ग की आकांक्षा में राम मंदिर निर्माण के पुण्य कार्य में जुटा देगा। संघ के इशारे पर इसकी शुरुआत ओबीसी को साथ लेकर 10 अप्रेल, 2018 को आरक्षण विरोधी राष्ट्रव्यापी मुहिम से की जानी प्रस्तावित है।
यद्यपि मैं आशान्वित हूं कि ओबीसी में शामिल जातियां इतनी भोली या मूर्ख नहीं हैं कि वे संघ-भाजपा के हिंदुत्व तथा ओबीसी प्रेम को समझ नहीं पायें। इसके बावजूद भी मेरा स्पष्ट मत है कि यदि हम अजा एवं अजजा वर्गों के लोगों को ओबीसी समुदायों को सम्भावित आरक्षण विरोधी मुहिम का हिस्सा नहीं बनने देना है तो सच्चे-झूठे सभी अम्बेडकरवादियों, बसपाइयों, बामसेफियों और नास्तिकों को ओबीसी तथा मुसलमानों के माथे पर-अम्बेडकरवाद, नास्तिकता, जयभीम, नमोबुद्धाय, बहुजन (बुद्धिष्टों के वंशज), दलित, मूलनिवासी (शूद्रवंशी), शोषित, अछूत, बुद्धिष्ट, अहिंदू जैसे सामुदायिक पहचान निह्नों तथा अपने महापुरुषों को थोपने से परहेज करना होगा। केवल इतना ही नहीं, बल्कि हिंदु धर्म एवं हिंदू धर्म प्रतीकों के विरोध में की जाती रही अशिष्ट बयानबाजी या गतिविधियों को भी सुधारना होगा। क्योंकि देश और समाज के सौहार्द को बिगाड़कर हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। याद रखना होगा कि हमारी लड़ाई व्यक्तिगत, सामाजिक या धार्मिक नहीं, बल्कि हम अपने संवैधानिक हकों को हासिल करना चाहते हैं। सबसे महत्वूपर्ण बात वंचित समुदायों की संयुक्त विचारधारा, संयुक्त नेतृत्व एवं संयुक्त निगरानी व्यवस्था अविलम्ब कायम करने के लिये संयुक्त राष्ट्रीय संगठनों पर 70 साल से काबिज अजा नेतृत्व को तुरंत त्यागपत्र देकर अपनी एकांगी तानाशाही नीतियों में बदलाव लाकर सकारात्मक पहल करने की जरूरत है। अंतिम बात-हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!!
जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी, सब एक समान।।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111-03.04.2018

Saturday, March 31, 2018

हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन की ओर से राष्ट्रपति के नाम 'न्यायिक समीक्षा के बहाने अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी न्यायिक हत्या के विरुद्ध संज्ञान लेने के संबंध में ज्ञापन।'

हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन की ओर से राष्ट्रपति के नाम 'न्यायिक समीक्षा के बहाने अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी न्यायिक हत्या के विरुद्ध संज्ञान लेने के संबंध में ज्ञापन।'
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हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन (भारत सरकार की विधि अधीन दिल्ली से रजिस्टर्ड राष्ट्रीय संगठन R. No.: ROS/North/452/2015), राष्ट्रीय प्रमुख का कार्यालय: 7 तंवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006, राजस्थान
ज्ञापन-पत्र , दिनांक: 31.03.2018
प्रतिष्ठा में,
राष्ट्रपति, भारत सरकार, राष्ट्रपति भवन, नयी दिल्ली-110001

विषय: न्यायिक समीक्षा के बहाने अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी न्यायिक हत्या के विरुद्ध संज्ञान लेने के संबंध में ज्ञापन।

संदर्भ: अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को निष्प्रभावी करने के मकसद से भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय दिनांक: 20.03.2018




माननीय महोदय,

उपरोक्त विषय एवं संदर्भ में आपका ध्यान आकृष्ट करके आपको अवगत करवाया जाता है कि संसद द्वारा अधिनियमित कानूनों की न्यायिक समीक्षा करना और सभी कानूनों का सही से क्रियान्वयन करवाना न्यायपालिका का अधिकार और दायित्व दोनों है। यह भी सर्वविदित है कि भारत में जन्मजातीय आधार पर हजारों सालों से जारी दुराशय पूर्वक विभेद और उत्पीड़न को रोकने के लिये संसद द्वारा अधिनियमित अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के सम्पूर्ण प्रावधान, आज तक भारत के किसी भी राज्य में अधिनियम के प्रावधान के अनुसार लागू नहीं किये गये।
  • 1. इसके बावजूद भारत की न्यायपालिका द्वारा स्वयं संज्ञान लेकर, इस विधिक अवज्ञा के लिये किसी भी सरकार को इसके लिये जिम्मेदार या दोषी नहीं ठहराया गया।
  • 2. इसके ठीक विपरीत बिना स्वतंत्र और आधिकारिक आंकड़ों के अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के दुरुपयोग को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा न्यायिक समीक्षा के नाम पर इस अधिनियम के प्रावधानों को इस प्रकार से बदल दिया गया, जिससे कि उत्पीड़ित को नहीं, बल्कि अत्याचार करने वालों को संरक्षण मिल सके।
  • 3. आपको ज्ञात है कि अजा एवं अजजा के हितों से सम्बद्ध संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों की न्यायपालिका द्वारा 1950 से संकीर्ण और नकारात्मक व्याख्या की जाती रही हैं। जिन्हें निष्प्रभावी करने के लिये संसद को अनेकों बार संविधान में संशोधन करने पड़े हैं। जिससे वंचित वर्गों के प्रति न्यायपालिका के संकीर्ण और नकारात्मक न्यायिक दृष्टिकोण की हकीकत उजागर और प्रमाणित हो चुकी है।
  • 4. आपको ज्ञात है कि न्यायपालिका के उपरोक्त दृष्टिकोण की मूल वजह है-अनुच्छेद 16 (4) की अनदेखी करके सरकार द्वारा न्यायपालिका में अजा एवं अजजा वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया जाना है। 20 मार्च, 2018 को पारित उपरोक्त न्यायिक निर्णय भी इसी बात का प्रमाण है कि न्यायपालिका द्वारा वंचित वर्गों के हितों की नकारात्मक और संकीर्ण व्याख्या लगातार जारी है।
  • 5. आपको ज्ञात है कि 20 मार्च, 2018 को पारित उपरोक्त न्यायिक निर्णय के मार्फत वंचित वर्गों को कानून के संरक्षण से महरूम कर दिया गया है। साथ ही जातीय विभेद तथा उत्पीड़न करने की मानसिकता के लोगों को मनमाने अपराध करने की खुली छूट मिल गयी है।
  • 6. आपको ज्ञात है कि न्यायिक समीक्षा के आधार पर किसी कानून को बदलना न्यायपालिका के अधिकार से बाहर है। इसके बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक समीक्षा के बहाने अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाया गया निर्णय अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की न्यायिक हत्या के समान है।
  • 7. जिस देश में सामान्य अपराधियों के विरुद्ध रिपोर्ट नहीं लिखना आम बात है, वहां सदियों से उत्पीड़ित तथा विभेद के शिकार करोड़ों लोगों को, उन्हीं उत्पीड़कों के रहमो-करम पर छोड़ देना, जो हमेशा से अन्याय करते रहे हैं, यह न्यायशास्त्र के मौलिक सिद्धानों और प्राकृतिक न्याय का मजाक है। इन हालातों में अजा एवं अजजा वर्गों में शामिल हजारों समुदायों के करोड़ों लोग संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र में निसहाय, निरीह और अत्याचारियों के रहमो-करम पर जीने को विवश हो जायेंगे। जिससे उनका लोकतंत्र से विश्वास उठ सकता है।
आग्रह एवं अपेक्षा
उपरोक्तानुसार वंचित वर्गों से जुड़े तथ्यों और जमीनी हालातों से अवगत करवाते हुए, वंचित वर्गों के हितों के लिये सेवारत हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के देशभर में सेवारत लाखों समर्थकों, सहयोगियों तथा सदस्यों की ओर से आप से विशेष आग्रह और उम्मीद है कि आप भारत के राष्ट्रप्रमुख एवं संविधान के सर्वोच्च संरक्षक के रूप में आपकी सरकार को आदेश जारी करके अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के बारे पारित न्यायिक निर्णय को उचित संवैधानिक प्रक्रिया के जरिये लागू होने से अविलम्ब रुकवाकर संविधान एवं इंसाफ की गरिमा को कायम रखकर वंचित वर्गों की लोकतंत्र में अटूट आस्था तथा संवैधानिक विश्वास को जिंदा रखेंगे।
भवदीय
(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा)
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन

Saturday, March 24, 2018

डबल स्टैंडर्ड न्यायपालिका (double standard judiciary) जिंदाबाद!

*डबल स्टैंडर्ड न्यायपालिका (double standard judiciary) जिंदाबाद!*

प्राप्त जानकारी के अनुसार भारतीय न्यायपालिका के न्याय के देवता ने झारखंड जेल में बन्द भाजपा के 2 विधायकों को राज्यसभा चुनाव में भाग लेने की इजाजत सहजता से दे दी। इसके ठीक विपरीत उत्तर प्रदेश में कारावास झेल रहे मिश्रा मित्र मायावती की बसपा के 1 विधायक और कांग्रेस मित्र अखिलेश की सपा के विधायक को न्याय के देवताओं ने मताधिकार से वंचित कर दिया। यदि इन मामलों को लेकर न्यायपालिका की संघ-भाजपा के प्रति निष्ठा और स्वामी भक्ति पर सवाल उठाने की हिमाकत की तो न्यायिक अवमानना का डंडा और कानून का फंदा जेल की हवा खिला सकता। कम से कम मुझे इसका भय नहीं। मुझे याद है, जेल का फंदा क्या होता है और कानून की गति कैसी होती है? बहुत छोटी उम्र में ही (1982 से 1986) ही इसका अनुभव हो चुका है। कोई भी कल्पना कर सकता है कि 4 साल, 2 माह, 26 दिन जेल में गुजारने के बाद हाई कोर्ट को मुझे निर्दोष करार देने की फुर्सत मिली थी। ऐसे में मुझे कानून और कोर्ट की चौखट का कितना अनुमान और भान होगा? डबल स्टैंडर्ड न्यायपालिका (double standard judiciary) जिंदाबाद!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 9875066111/24.03.2018

Thursday, March 22, 2018

प्रधानमंत्री के नाम खुला खत: कानून के दुरुपयोग की आशंका में न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग कितना जायज?

प्रधानमंत्री के नाम खुला खत: कानून के दुरुपयोग की आशंका में न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग कितना जायज?

प्रधानमंत्री जी आपको ज्ञात हो ही चुका है कि अजा एवं अजजा वर्गों के नेतृत्व से विहीन सुप्रीम कोर्ट ने अजा एवं अजजा वर्गों के संरक्षण के लिये संसद द्वारा निर्मित कानून को दुरुपयोग की आशंका बताकर निष्प्रभावी कर दिया है! जिसके चलते देशभर के अजा एवं अजजा वर्गों के आम लोग भयंकर रूप से डरे, सहमे और आतंकित महसूस कर रहे हैं। इसके बावजूद आपकी ओर से इस अत्यंत गम्भीर विषय पर प्रधानमंत्री के रूप में आपकी चुप्पी हालातों को और भी खतरनाक बना रही है। यह स्थिति स्वस्थ एवं परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिचायक नहीं कही जा सकती। अत: इस खुले खत के मार्फत आपको हालातों से सार्वजनिक रूप से अवगत करवाना अपरिहार्य हो गया है।

प्रधानमंत्री जी सबसे पहला विचारणीय तथ्य अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को संसद द्वारा क्यों अधिनियमित किया गया? निश्चय ही इन दोनों वर्गों के साथ होने वाले अत्याचारों को तत्कालीन प्रभावी कानूनों और नियमों से रोकना संभव नहीं था। इसलिये यह नया कानून बनाया गया था। यह सर्वज्ञात तथ्य है कि जब भी किन्हीं उत्पीड़ित या कमजोर या अशक्त या निशक्त समुदायों को अतिरिक्त या विशेष संरक्षण सहयोग की वास्तविक जरूरत होती है तो किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य में, लोकतंत्रीय सरकारों का संवैधानिक दायित्व होता है कि उन समुदायों को कानून का विशेष/अतिरिक्त संरक्षण प्रदान किया जाये।

प्रधानमंत्री जी आप जानते हैं कि 1950 से 1989 तक भारत में अजा एवं अजजा वर्गों के विरुद्ध जारी अत्याचारों तथा अपराधों के आंकड़ों तथा घटनाओं का अध्ययन एवं विचारण करने के बाद निर्वाचित संसद ने यह उचित समझा कि इन दोनों वर्गों को शेष वर्गों से विशेष कानूनी संरक्षण की जरूरत है। इसीलिये अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को अधिनियमित किया गया। इसके लागू होने के बाद भी अजा एवं अजजा के विरुद्ध अपराधों और अत्याचारों में पूरी तरह से रुकावट नहीं आयी। अत: इस अधिनियम में संसद द्वारा उचित संशोधन भी किये गये। इसके उपरांत भी सरकारी आंकड़े बताते हैं कि आपकी सरकार के पदासीन होने के बाद पिछले कुछ वर्षों में अजा एवं अजजा वर्गों के निरपराध आम लोगों के विरुद्ध अत्याचार तथा अपराध की घटनाओं में लगातार एवं उत्तरोत्तर वृद्धि होती रही है।

प्रधानमंत्री जी उक्त पृष्ठभूमि में इंसाफ-पसंद विधिवेत्ताओं द्वारा उक्त अधिनियम को पर्याप्त नहीं समझा जा रहा था तथा अजा एवं अजजा वर्गों को अतिरिक्त वैधानिक संरक्षण की जरूरत अनुभव की जा रही थी। ऐसे विकट समय में आपकी सरकार की ओर से कोर्ट में कमजोर एवं औपचारिक पैरवी की जाती है तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्णय सुनाता है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 का दुरुपयोग होने की आशंका या दुरुपयोग हो रहा है और इसी अप्रमाणिक, संदेहास्पद एवं काल्पनिक आधार पर संसद द्वारा निर्मित इस कानून के प्रावधानों को लगभग निरस्त कर दिया गया है। मगर आपकी चुप्पी नहीं टूटी है!

प्रधानमंत्री जी यहां य​ह तथ्य विचारणीय है कि इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि अजा एवं अजजा के उत्थान और संरक्षण हेतु उपबन्धित संवैधानिक प्रावधानों की संकीर्ण और नकारात्मक व्याख्या करके सुप्रीम कोर्ट ने 1950 से लगातार हर बार उन्हें कमजोर किया है। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे संकीर्ण व्याख्या करने वाले निर्णयों को निष्प्रभावी करने हेतु तत्कालीन संसद द्वारा संविधान में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट को बार-बार संकेत दिया गया कि न्यायपालिका द्वारा कानूनों का निर्वचन अजा एवं अजजा वर्गों के हितों के विरुद्ध किया जा रहा है। इसके बावजदू सुप्रीम कोर्ट द्वारा संकीर्ण एवं नकारात्मक व्याख्या किये जाने का सिलसिला लगातार जारी है। आपकी सरकार के कार्यकाल में इसमें तेजी आयी है।

प्रधानमंत्री जी इन हालातों में न केवल अजा एवं अजजा वर्गों के लिये, बल्कि देश की 90 फीसदी वंचित आबादी के लिये न्यायपालिका का यह दृष्टिकोंण गंभीर चिंता का विषय बन चुका है! क्योंकि केवल मात्र किसी कानून के दुरुपयोग की आशंका को आधार बनाकर वंचित वर्गों के संरक्षण के लिये संसद द्वारा निर्मित कानून को एक झटके में निरस्त कर देना, लोकतंत्र सबसे बड़े आधार संसद को कमजोर करने और अति न्यायिक सक्रियता का जीता जागता प्रमाण है। यह इसलिये भी विशेष चिंता का कारण है कि बिना किसी निष्पक्ष जांच और बिना किन्हीं आधिकारिक आंकड़ों के सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने देश के निर्वाचित सांसदों द्वारा निर्मित कानून को निष्प्रभावी कर दिया है! क्या यह न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग नहीं है?

प्रधानमंत्री जी इन हालातों में केन्द्र सरकार को चाहिये कि यदि किन्हीं कानूनों का दुरुपयोग होता है तो ऐसे कानूनों का दुरुपयोग रोकने के लिये अधिक कठोर कानून बनाकर, उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जावे और दुरुपयोगों को रोकने में विफल/जिम्मेदार संस्थानों के विरुद्ध कठोर दण्डात्मक प्रावधान लागू किये जाना सुनिश्चित किया जावे। अन्यथा कानूनों के दुरुपयोग के बहाने, कानूनों को निरस्त/निष्प्रभावी किया जाना शुरू हो गया तो ऐसे सैकड़ों कानूनों तथा हजारों प्रावधानों को निरस्त करना होगा। जिनका हर पल दुरुपयोग होते रहने की आशंका बनी रहती है और अनेक बार दुरुपयोग होता भी है। ऐसे कुछ ज्वलंत उदाहरण आपके विचारण हेतु पेश हैं:—

1—कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय कुछ गिने—चुने परिवारों के लोगों को ही सुप्रीम कोर्ट एवं होई कोर्टों में जज नियुक्त किये जाते रहे हैं। क्या कॉलेजियम से जजों की नियुक्ति का अधिकार छीन लिया जाना चाहिये?
2—उच्च न्यायपालिका में 67 फीसदी पदों पर सीधे जजों की नियुक्ति करने में वंचित वर्गों के योग्य तथा पात्र लोगों की 67 साल से सरेआम अनदेखी की जाती रही है। क्या इन 67 फीसदी पदों पर जजों की सीधी नियुक्ति का संवैधानिक प्रावधान निरस्त कर दिया जाना चाहिये?
3—विज्ञापन के नाम पर सरकारों द्वारा जनता की गाढी कमाई से संग्रहित राजस्व को मीडिया को लुटाया जाता रहता है। क्या सरकार से विज्ञापन प्रदान करने के विशेष विवेकाधिकार को प्रतिबन्धित कर दिया जाना चाहिये?
4—शासकीय अधिकारियों को मिले वित्तीय एवं प्रशासकीय विवेकाधिकारों का हमेशा से जमकर दुरुपयोग होते रहने के आरोप लगते रहे हैं। क्या विवेकाधीन अधिकार सामाप्त कर दिये जाने चाहिये?
5—सांसदों और विधायाकों को मिले बस—रेल यात्रा पासों का दुरुपयोग होता रहता है। क्या सांसदों और विधायकों को बस—रेल यात्रा पास बंद कर दिये जाने चाहिये?
6—जनहित में उपयोग करने हेतु आवंटित सरकारी वाहनों का निजीहित में उपयोग होता रहता है। क्या सभी सरकारी वाहनों का संचालन बंद कर दिया जाना चाहिये?
7—यातायात पुलिस द्वारा यातायात नियमों का जमकर दुरुपयोग किया जाता है। क्या यातायात नियमों को निरस्त कर देना चाहिये?
8—बैंकों द्वारा प्रदान स्वीकृत किये जाने वाले लोन में मनमानी और भेदभाव के आरेप लगते रहते हैं। क्या बैंकों को लोन स्वीकृत करने पर पाबंदी लगा देनी चाहिये?
9—सरकारी बसों में परिचालों द्वारा टिकिट जारी किये बिना यात्रियों को बिठाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया जाता है। क्या सरकारी बस संचालन बंद कर देना चाहिये?
10—सरकारी सेवाओं में भर्ती की प्रक्रियाओं में जमकर भ्रष्टाचार होता है। क्या भर्ती प्रक्रिया बंद कर दी जानी चाहिये?
11—आधे से अधिक विभागीय अनुशासनिक मामले उच्चाधिकारियों की तानाशाही और मनमानी का भय बनाये रखने के लिये बनाये जाते हैं। क्या अनुशासनिक नियमों को रद्द कर दिया जाना चाहिये?
12—टेलीफोन मोबाईल पर बात करते समय टैपिंग करके व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन किया जाता है। क्या टेलीफोन पर बात करना प्रतिबन्धित/बंद कर देना चाहिये?
13—​हाई टेंसन बिजली की लाइनों से आयेदिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं और लोगों की जानमाल को खतरा होता रहता है। क्या हाई टेंसन बिजली की लाइनों को हटा दिया जाना चाहिये?
14—आदर—सत्कार और शिष्टाचार के नाम पर शासकीय अधिकारियों, जजों और मंत्रियों को मिलने वाले बजट का जमकर निजीहित में दुरुपयोग होता है। क्या आदर—सत्कार और शिष्टाचार के नाम पर मिलने वाले बजट को समाप्त कर दिया जाना चाहिये।
15—सुप्रीम कोर्ट सहित अनेक हाई कोर्ट अनेकों मामलों में इस बात को स्वीकार चुके हैं कि हत्या, बलात्कार, चोरी, डकैती जैसे गंभीर अपराधों के कानून का जमकर दुरुपयोग होता है। क्या इन कानूनों को निरस्त कर दिया जाना चाहिये? इत्यादि!

प्रधानमंत्री जी आप भूले नहीं होंगे कि 6 फरवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ में शामिल जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि 'अगर किसी तकनीक का दुरुपयोग हो रहा है तो इसका मतलब ये नहीं किसी कानून को ही रद्द कर दिया जाए। ऐसे कोर्ट के फैसलों की लंबी कतार है जिनमें कहा गया है कि सिर्फ मिसयूज होने की संभावना से कानून को रद्द नहीं किया जा सकता।' इसके बावजूद दो जजों की पीठ ने पांच जजों की राय को दरकिनार करते हुए अजा एवं अजजा वर्गों के विरुद्ध निर्णय सुनाते हुए सीधे—सीधे 1989 से पहले की स्थिति ला दी है। सबसे दु:खद पहलु तो यह है कि आपराधिक मामलों में विचारण का अधिकार न्यायपालिका का होता है, जहां पक्ष एवं विपक्ष की उपस्थिति में विचारण किया जाता है, लेकिन सु्प्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने विचारण का हक पुलिस के उन उच्चाधिकारियों को सौंप दिया है, जिनकी अनदेखी, सहमति, संरक्षण या चुप्पी के कारण अजा एवं अजजा वर्गों के लोगों के विरुद्ध बेरोकटोक अत्याचार एवं अपराध किये जाते रहते हैं।

प्रधानमंत्री जी वंचित वर्गों के हित संरक्षण तथा संविधान एवं लोकतंत्र की रक्षा हेतु देशभर में सेवारत हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के लाखों समर्थकों एवं सदस्यों की ओर से आपको याद दिलाया जाता है कि प्रधानमंत्री के रूप में वंचित वर्गों की हिफाजत करना आपका संवैधानिक दायित्व है। आप विचार कीजिये कि कानून के दुरुपयोग की आशंका में न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग कितना जायज है? आशा है आप अपने दायित्वों का निर्वाह करेंगें, अन्यथा लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ जायेगा और वंचित वर्गों के विरुद्ध सुनाये जाने वाले इस प्रकार के न्यायिक निर्णय कानून—व्यवस्था एवं आपकी राजनीतिक पार्टी तथा सरकार के अस्तित्व के लिये चुनौती बन सकते हैं! उम्मीद है आप इस पर ध्यान देंगे! प्रधानमंत्री जी अंत में यह और कि 'हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!' जय भारत! जय संविधान! नर, नारी सब एक समान! इस खुले खत को वंचित समुदायों के देश के हर एक नागरिक का समर्थन मिले बिना न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती। क्योंकि वंचित वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधियों की जबान को तो लकवा मार गया लगता है? अत: आम लोगों को खुद ही अपनी आवाज उठानी होगी और जनप्रतिनिधियों से सवाल करने की हिम्मत जुटानी होगी।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 22.03.2018, 9875066111